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प्राचीन और मध्यकालीन आर्य भाषाओ -संस्कृत...

प्राचीन और मध्यकालीन आर्य भाषाओ -संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश का क्षेत्र सार्वदेशिक था, जिस रूप में वे उपलब्ध है, उस रूप में उनका व्याकरणिक ढांचा भी अलग था। इन भाषाओ में प्रादेशिक निष्ठां नहीं थी, किन्तु जातीय भाषाओ में यह निष्ठां बढ़ी। संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से उत्तर भारत की आधुनिक आर्य भाषाओ का विकास हुआ। ऐसा विश्वास किया जाता रहता है और इसके लिए सिद्धांत भी गढ़े गए थे, किन्तु अब यह धारणा कि हिंदी या बांग्ला आदि अपभ्रश से निकली, खंडित हो चुकी है। जातीय भाषाओ ने संस्कृत और अपभ्रंश से बहुत कुछ लिया है। हिंदी ने उनकी विरासत को सबसे अधिक ग्रहण किया-विशेष रूप से अपभ्रंश की विरासत को। शब्द-समूह, उच्चारण तथा व्याकरणिक ढांचे के अलग होने से अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य का अंग नहीं माना जा सकता, किन्तु नैरंतर्य के लिए उसका अध्ययन आवश्यक है।
सांस्कृतिक नैरंतर्य के लिए किसका अध्ययन आवश्यक है ?

A

संस्कृत

B

अपभ्रंश

C

प्राकृत

D

हिंदी

लिखित उत्तर

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The correct Answer is:
B

अपभ्रंश से उत्तर भारत की आधुनिक आर्य भाषाओ का विकास हुआ तथा जातीय भाषाओ ने संस्कृत और अपभ्रंश से बहुत कुछ लिया। इसी आधार पर सांस्कृतिक नैरंतर्य के लिए .अप्रभ्रंश. का अध्ययन आवश्यक है।
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