विशेषण
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दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 35 माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिचन किन्तु फिर भी कर रहा इतना निवेदन थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण। माँ मुझे बलिदान का वरदान दे दो तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे दो और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो। सुमन अर्पित चमन अर्पित नीड़ का कण-कण समर्पित चाहता हूँ, देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ। 'बलिदान' शब्द से बना विशेषण है
हमारे व्यावहारिक अथवा वास्तविक जीवन में भी यही सिद्धांत काम करता है कि हम समाज अथवा लोगों को जो देते हैं वही हमारे पास लौटकर आता है। हम लोगों से प्यार करते हैं तो लोग भी हमें प्यार करते हैं लेकिन यदि हम लोगों से घृणा करते हैं तो वे भी हमसे घृणा ही करेंगे इसमें संदेह नहीं। यदि हम सबके साथ सहयोग करते हैं अथवा ईमानदार बने रहते हैं तो दूसरे भी हमारे प्रति सहयोगात्मक और ईमानदार हो जाते है। इसे आकर्षण का नियम कहा गया है। हम जैसा स्वभाव विकसित कर लेते हैं वैसी ही चीजें हमारी ओर आकर्षित होती हैं। गंदगी मक्खी को आकर्षित करती है तो फूल तितली को आकर्षित करते हैं। यदि हम स्वयं को फूल जैसा सुंदर, सुवासित, मसृण व रंगीन अर्थात सुंदर गुणों से युक्त बना लेंगे तो स्वाभाविक है कि समाज के सुंदर गुणी व्यक्ति हमारी ओर आकर्षित होंगे ही। यदि हम चाहते हैं कि हमारे संपर्क में केवल अच्छे लोग ही आएँ तो हमें स्वयं को उनके अनुरूप बनाना होगा - दुर्गुणों में नहीं, सदगुणों में। अपने व्यवहार को व्यवस्थित व आदतों को अच्छा करना होगा। अपनी वाणी को कोमल व मधुर बनाना होगा। केवल मात्र बाहर से नहीं, मन की गहराइयों में रचयं को सुंदर बनाना होगा। यदि हम बाहरी रुप स्वरुप से नहीं, वरन मन से सुंदर बन पाते है तो विचार और कर्म स्वयं सुंदर हो जाएंगे। जीवन रूपी सितार ठीक बजने लगेगा। जीवन के प्रति सत्यम् शिवम् और सुंदरम् का आकर्षण बढ़ने लगेगा। फूल के लिए कौन-सा विशेषण ul(" अनुपयुक्त ") है?
कमज़ोर विचारक तत्काल उत्तर की ओर दौड़ता है। पर सोचने वाले बच्चे .. समय लेते हैं। सवाल पर विचार करते हैं। क्या यह अन्तर केवल सोचने के कौशल के होने या न होने के कारण है? एक ऐसा कौशल जो केवल एक तकनीक है और जिसे, अगर भाग्य ने साथ दिया तो, हम बुद्धि से बच्चों कों सिखा सकते हैं। क्या बच्चों को इस कौशल में प्रशिक्षित कर सकते हैं? मुझे भय है कि ऐसा नहीं है। अच्छा विचारक सोचने में समय इसलिए लगा सकता है, क्योकि वह अनिश्चय को सह सकता है। वह इस बात को भी झेल सकता है कि वह कोई चीज नहीं जानता। पर कमजोर विचारक को कुछ न जानने की कल्पना ही असहनीय लगती है। क्या इस पूरे विश्लेषण से हम यह नहीं पाते कि असल में इन बच्चों में 'गलत' होने का भय बैठा होता है? बेशक यही भय है जो मॉनिका जैसे बच्चों पर भयानक दबाव डालता है। ठीक ऐसे ही दबाव हैल भी महसूस करता है। शायद मैं भी। मॉनिका अकेली नहीं है जो सही होना चाहती है और गलत होने से डरती है। पर यहाँ शायद एक दूसरी असुरक्षा की भावना काम करती होती है। यह असुरक्षा की भावना पैदा होती है सवाल के लिए कोई भी जवाब नहीं होने से। . वह गलत होने से ... डरती है।' वाक्य में उचित क्रिया-विशेषण शब्द आएगा।
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दीजिए। गत बीस वर्षों में भारत के प्रत्येक नगर में कारखानों की जितनी तेजी से वृद्धि हुई है। उससे वायुमण्डल पर बहुत प्रभाव पड़ा है क्योंकि इन कारखानों की चिमनियों से चौबीसों घण्टे निकलने वाले धुएँ ने सारे वातावरण को विषाक्त बना दिया है। सड़कों पर चलने वाले वाहनों की संख्या में तेजी से होने वाली वृद्धि भी वायु प्रदूषण के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। आज असंख्य प्रकार की सॉस और फेफड़ों की बीमारियाँ आम बात हो गई है। बढ़ती हुई जनसंख्या, लोगों का शहरों की ओर पलायन भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रदूषण का कारण है। शहरों की बढ़ती जनसंख्या के लिए सुविधाएँ जुटाने के लिए वृक्षों और वनों को भी निरन्तर काटा जा रहा है। निम्नलिखित में से सार्वनामिक विशेषण है
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के उत्तर दीजिए। गत बीस वर्षों में भारत के प्रत्येक नगर में कारखानों की जितनी तेजी से वृद्धि हुई है। उससे वायुमण्डल पर बहुत प्रभाव पड़ा है क्योंकि इन कारखानों की चिमनियों से चौबीसों घण्टे निकलने वाले धुएँ ने सारे वातावरण को विषाक्त बना दिया है। सड़कों पर चलने वाले वाहनों की संख्या में तेजी से होने वाली वृद्धि भी वायु प्रदूषण के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। आज असंख्य प्रकार की सॉस और फेफड़ों की बीमारियाँ आम बात हो गई है। बढ़ती हुई जनसंख्या, लोगों का शहरों की ओर पलायन भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रदूषण का कारण है। शहरों की बढ़ती जनसंख्या के लिए सुविधाएँ जुटाने के लिए वृक्षों और वनों को भी निरन्तर काटा जा रहा है। क्रिया विशेषण है
स्थूल एवं बाह्य पदार्थ सूक्ष्म एवं मानसिक पदार्थों एवं भावों की अपेक्षा अधिक महत्त्व के विषय नहीं हैं। जो व्यक्ति रचनात्मक कार्य । करने में समर्थ है, उसे भौतिक स्कूल लाभ अथवा प्रलोभन न तो लुभाते हैं और न ही प्रोत्साहित करते हैं। विश्व में विचारक दस में से एक ही व्यक्ति होता है। उसमें भौतिक महत्त्वकांक्षाएँ अत्यल्प होती हैं। 'पूँजी' का रचयिता कार्लर मार्क्स जीवनभर निर्धनता से जूझता रहा। राज्याधिकारियों ने सुकरात । को मरवा डाला, पर वह जीवन के अन्तिम क्षणों में भी शात था, क्योंकि वह अपने जीवन के लक्ष्य का भली-भांति निर्वाह कर चुका था। यदि उसे पुरस्कृत किया जाता, प्रतिष्ठा के अंबारों से लाद दिया जाता, परन्तु अपना काम न करने दिया जाता तो निश्चय ही वह अनुभव करता कि उसे कठोर रूप में दंडित किया गया है। ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हमें बाहरी सुख-सुविधाएँ आकर्षित करती हैं, वे अच्छे जीवन के लिए अनिवार्य लगने लगती हैं किन्तु महत्त्वपूर्ण यह है कि क्या हमने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर दिया? यदि इसका उत्तर 'हाँ' है तो बाह्य वस्तुओं का अभाव नहीं खलेगा और यदि 'नहीं' है तो हमें अपने को भटकने से बचाना होगा और लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा 'भली भाति निर्वाह कर चुका था।' उपर्युक्त वाक्यांश में क्रिया-विशेषण है: