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कथन |Introduction|ग्लोबल वॉर्मिंग भूमंडल...

कथन |Introduction|ग्लोबल वॉर्मिंग भूमंडलीकरण तपन |भारत लोकतंत्र की चुनौतियों|उपाय|Revision

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Introduction|औद्योगीकरण का युग|पूर्व औद्योगीकरण|आदि औद्योगीकरण|व्यापारियों का गाँवो पर ध्यान देने का कारण|ब्रिटेन में आदि औद्योगीकरण के लक्षण|कारखानों की शुरुआत|कारखानों से लाभ|One Minute Revision

भारत का कपड़ा उद्योग का युग|गुमाश्ता|मैनचेस्टर का भारत में प्रकोप|भारत में कारखानों की शुरुआत|One Minute Revision

Introduction (परिचय)|Banking In Ancient India (प्राचीन भारत में बैंकिंग)|Banking In Medieval India (मध्यकालीन भारत में बैंकिंग)|Banking In Modern India (मध्यकालीन भारत में बैंकिंग)|Reserve Bank Of India (भारतीय रिजर्व बैंक)|Post Independence Period (स्वतंत्रता के बाद की अवधि)|OMR|Summary

Introduction (परिचय)|Banking In Ancient India (प्राचीन भारत में बैंकिंग)|Banking In Medieval India (मध्यकालीन भारत में बैंकिंग)|Banking In Modern India (मध्यकालीन भारत में बैंकिंग)|Reserve Bank Of India (भारतीय रिजर्व बैंक)|Post Independence Period (स्वतंत्रता के बाद की अवधि)|OMR|Summary

Statement/ कथन : “On October 2, let us pledge to make the country free of single-use plastic.”- Prime Minister of India/ “2 अक्टूबर को, आइये हम देश को एकल प्रयोग वाले प्लास्टिक से मुक्त करने की शपथ लें |” -भारत के प्रधानमंत्री Conclusion/ निष्कर्ष: I. All Indians should reduce and then completely eliminate the consumption of single-use plastic like packaged drinking water / सभी भारतीयों को पैकेज्ड पेयजल जैसे एकल प्रयोग वाले प्लास्टिक की खपत को कम करना चाहिए तथा फिर पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहिए | II.India is going to be completely plastic free on October 2 / भारत 2 अक्टूबर को प्लास्टिक से पूरी तरह मुक्त होने जा रहा है |

निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही। वह तो मात्र एक प्रेरक है कि शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें। उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन-अध्यापन की परंपरागत विधियों से दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिनप्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानवमूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके। पाठगत बाधाओं को दूर करते हुए विद्यार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है। भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती। जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, छंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किंतु आज लय और प्रवाह का महत्त्व है। कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रति सजगता समझना आवश्यक है। निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्त्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है। कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है। कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है। मूल्यांकन वस्तुतः सीखने की ही एक प्रणाली है, ऐसी प्रणाली जो रटंत प्रणाली से मुक्ति दिला सके। परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके। इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बँधे-बँधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते। शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर की अपेक्षा नहीं कर सकता। विद्यार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किंतु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी। इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक है। कौन-सा कथन आज के शिक्षक की भूमिका के बारे में सत्य नहीं है ?

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए: आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही। वह तो मात्र एक प्रेरक है कि शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें। उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन-अध्यापन की परंपरागत विधियों से दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिनप्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानवमूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके। पाठगत बाधाओं को दूर करते हुए विद्यार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है। भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती। जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, छंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किंतु आज लय और प्रवाह का महत्त्व है। कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रति सजगता समझना आवश्यक है। निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्त्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है। कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है। कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है। मूल्यांकन वस्तुतः सीखने की ही एक प्रणाली है. ऐसी प्रणाली जो रटंत प्रणाली से मुक्ति दिला सके। परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके। इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बँधे-बँधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते। शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर की अपेक्षा नहीं कर सकता। विद्यार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किंतु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी। इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक है। कौन-सा कथन आज के शिक्षक की भूमिका के बारे में सत्य नहीं है?

Introduction(परिचय)|1st Phase Of Nationalization(राष्ट्रीयकरण का पहला चरण)|2nd Phase Of Nationalization(राष्ट्रीयकरण का दूसरा चरण)|Impact Of Nationalization(राष्ट्रीयकरण का प्रभाव)|Major limitations of nationalisation of bank in India(भारत में बैंक के राष्ट्रीयकरण की प्रमुख सीमाएँ)|Why there was need of reforms in banking sector(बैंकिंग क्षेत्र में सुधारों की आवश्यकता क्यों पड़ी?)|Banking Reform phase(बैंकिंग सुधार चरण)|OMR|Summary

गोदान' प्रेमचन्द जी की उन अमर कृतियों में से एक है, जिसमें ग्रामीण भारत की आत्मा का करुण चित्र साकार हो उठा है। इसी कारण कई मनीषी आलोचक इसे ग्रामीण भारतीय परिवेशगत समस्याओं का महाकाव्य मानते हैं तो कई विद्वान् इसे ग्रामीण-जीवन और कृषि-संस्कृति का शोक गीत स्वीकारते हैं। कुछ विद्वान् तो ऐसे भी हैं कि जो इस उपन्यास को ग्रामीण भारत की आधुनिक 'गीता' तक स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी हो, 'गोदान' वास्तव में मुंशी प्रेमचन्द का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें आचार-विचार, संस्कार और प्राकृतिक परिवेश, जो गहन करुणा से युक्त है, प्रतिबिम्बित हो उठा है। डॉ। गोपाल राय का कहना है कि 'गोदान' ग्राम-जीवन और ग्राम संस्कृति को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने वाला अद्वितीय उपन्यास है न केवल हिन्दी । के वरन् किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी उपन्यास में ग्रामीण समाज का । ऐसा व्यापक यथार्थ और सहानुभूतिपूर्ण चित्रण नहीं हुआ है। ग्रामीण जीवन और संस्कृति के अंकन की दृष्टि से इस उपन्यास का वही महत्त्व है, जो आधुनिक युग में युग जीवन की अभिव्यक्ति की दृष्टि से महाकाव्यों का हुआ करता था। इस प्रकार डॉ। राय गोदान को आधुनिक युग का महाकाव्य ही नहीं स्वीकारते वरन् सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य भी स्वीकारते हैं। उनके इस कथन का यही आशय है कि प्रेमचन्द जी ने ग्राम-जीवन से सम्बद्ध सभी पक्षों का न । केवल अत्यन्त विशदत्ता से चित्रण किया है, वरन् उनकी गहराइयों में जाकर उनके सच्चे चित्र प्रस्तुत कर दिए हैं। प्रेमचन्द जी ने जिस ग्राम-जीवन का चित्र गोदान में प्रस्तुत किया है, उसका सम्बन्ध आज ग्राम परिवेश से न होकर तत्कालीन ग्राम-जीवन से है। ग्रामीण जीवन को वास्तविक आधार प्रदान करने के लिए प्रेमचन्द जी ने चित्र के अनुरूप ही कुछ ऐसे खाँचे अथवा चित्रफलक निर्मित किए हैं, जो चित्र को - यथार्थ बनाने में सहयोगी सिद्ध हुए हैं। ग्रामीण किसानों के घर-द्वार, खेत-खलिहान और प्राकृतिक दृश्यों का ऐसा वास्तविक चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। 'गोदान' है