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देशवासियों सुनो देश को नमन करो देश ही आध...

देशवासियों सुनो देश को नमन करो देश ही आधार है, प्यार देश से करो।
लड़ रहे हो आज क्यों छोटी-छोटी बात पर, देश हित को भूलकर प्रांत, भाषा, जात पर, मिटा के भेदभाव को, देश को सुदृढ़ करो ।
भ्रष्टाचार की लहर उठ रही नगर-नगर, घोर अंधकार में सूझती नहीं डगर, ज्योति नीति-धर्म की आज तुम प्रखर करो।
देश आज रो रहा, देश का रुदन सुनो, बाँट दर्द देश का, मित्र देश के बनो प्रेम के पीयूष से, द्वेष का शमन करो।
कविता में नीति-धर्म की ज्योति प्रखर करने के लिए कहा गया है, ताकि -

A

देश को प्रेम किया जा सके।

B

देश का दर्द बाँटा जा सके।

C

आपसी भेदभाव दूर किया जा सके।

D

भ्रष्टाचार को दूर किया जा सके ।

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