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विकास के उच्च शिखर पर पताका फहराते हुए आ...

विकास के उच्च शिखर पर पताका फहराते हुए आज हम विज्ञान के उत्कर्ष काल में जी रहे हैं। परन्तु ये कैसी विडम्बना है कि मैला उठाने की सर्वाधिक घृणित प्रथा आज भी हमारे समाज में विद्यमान है। घर-घर मैला साफ करते नर-नारियों के प्रति हमारा समाज संवेदनशील न हो, ऐसा नहीं है। हमारी संवेदनाएँ या तो तीव्रता से उठती नहीं या स्वार्थ के आवरण में आवृत होकर घुट-घुट कर मर जाती हैं। बड़ी नालियों-नालों में नंगे बदन सफाई करते इंसान देखकर अपने सभ्य होने पर हमें क्यों नहीं आती? सड़क पर गाड़ियों, ठेलों और कमर पर मैला उठाते नर-नारियों को देखकर हम शर्म से धरती में क्यों नहीं गड़ जाते ? सीवर टैंकों की सफाई के समय जहरीली गैसों के प्रभाव से असमय ही काल-कवलित हो जाने वाले युवकों की माताओं का कारुणिक रुदन का श्रवण हम क्यों नहीं कर पाते? प्रतिकूल मौसमी दशाओं की मार झेलती, दुधमुंहे शिशुओं को रोता-बिलखता छोड़ घर-घर मैला उठाने वाली नारियाँ भोर होते ही निकल पड़ती हैं। हमारे लिए जो निकृष्ट और घृणित कर्म है, उनके लिए वही एक सत्कर्म है। हम देवत्व का मिथ्यावरण लपेटे घंटों और शंख ध्वनियों के बीच पुरोहिती का राग अलापते हैं और उन्हें तिरस्कृत कर पास भी नहीं फटकने देते। गंदगी उठाने वाले इस वन्दनीय समाज की सेवा से हम कभी उऋण नहीं हो सकते। यह तिरस्कार नहीं वन्दना के पात्र हैं। इस कुप्रथा को समूल उखाड़ फेंकने के लिए सामूहिक प्रयास अपरिहार्य है।
गद्यांश में 'पुरोहिती का राग अलापने वाले' कहकर लेखक ने किस भाव को प्रकट किया है?

A

उपहासात्मक भाव

B

उपदेशात्मक भाव

C

व्यंग्यात्मक भाव

D

विचारात्मक भाव

लिखित उत्तर

Verified by Experts

The correct Answer is:
C
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