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पुरुषार्थ दार्शनिक विषय है, पर दर्शन का ...

पुरुषार्थ दार्शनिक विषय है, पर दर्शन का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह थोड़े-से विद्यार्थियों का पाठ्य विषय मात्र नहीं है। प्रत्येक समाज को एक दार्शनिक मत स्वीकार करना होता है। उसी के आधार पर उसकी राजनीतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होता है। जो समाज अपने वैयक्तिक और सामूहिक जीवन को केवल प्रतीयमान उपयोगिता के आधार पर चलाना चाहेगा उसको बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। एक विभाग के आदर्श दूसरे विभाग के आदर्श से टकराएँगे। जो बात एक क्षेत्र में ठीक जॅचेगी वही दूसरे क्षेत्र में अनुचित कहलाएगी और मनुष्य के लिए अपना कर्तव्य स्थिर करना कठिन हो जाएगा। इसका परिणाम आज दिख रहा है। चोरी करना बुरा है, पर पराए देश का शोषण करना बुरा नहीं है। झूठ बोलना बुरा है, पर राजनीतिक क्षेत्र में सच बोलने पर अड़े रहना मूर्खता है। घर वालों के साथ, देशवासियों के साथ और परदेशियों के साथ बर्ताव करने के लिए अलग-अलग आचारावलियाँ बन गई हैं। इससे विवेकशील मनुष्य को कष्ट होता है।
समाज में जीवन प्रतीयमान उपयोगिता के आधार पर नहीं चल सकता, क्योकि

A

सभी व्यक्तियों का जीवन-दर्शन भिन्न होता है।

B

आचार सहिताएँ सभी के लिए अलग - अलग है

C

एक ही बात भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में उचित या अनुचित हो सकती है।

D

सभी मनुष्य विवेकशील नहीं होते।

लिखित उत्तर

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