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भाषा का प्रयोग दो रूपों में किया जा सकता...

भाषा का प्रयोग दो रूपों में किया जा सकता है-एक तो सामान्य जिससे लोक में व्यवहार होता है तथा दूसरा साहित्य रचना के लिए जिसमें प्रायः अलंकारिक भाषा का प्रयोग किया जाता है। साहित्यिक रचना के लिए प्रयुक्त भाषा लोकभाषा का कार्य आते हुए भी उससे भिन्न होती है, क्योंकि इसमें कवि की कल्पना भी काम करती है तथा उसे परिमार्जित रूप में प्रस्तुत करती है। विद्वानों का अनुमान है कि जब से संसार में साहित्य का सृजन आरम्भ हुआ है तभी से अलंकारिक भाषा प्रयोग में लाई जा रही है। संसार का प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद तथा आदि महाकाव्य रामायण इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इन दोनों रचनाओं में अलंकृत भाषा के उत्कृष्ट उदाहरण प्राप्त होते हैं। संसार के समस्त कवियों तथा साहित्यकारों ने इसी प्रवृत्ति का अनुकरण किया है। वस्तुतः अलंकृत भाषा के अभाव में काव्य, काव्य नहीं कहलाता। इसी बात का समर्थन करते हुए कहा भी गया है कि अलंकारविहीन कविता विधवा के समान होती है। आचार्य भामह का भी कथन है कि जिस प्रकार किसी रमणी की सुन्दरता अलंकारों के बिना पूर्ण नहीं होती, उसी प्रकार साहित्य भी आभूषणों के बिना शोभा नहीं पाता। आचार्य दण्डी ने अलंकारों को काव्य का शोभा विधायक धर्म माना है। आचार्य मम्मट और विश्वनाथ ने भी काव्य में अलंकार की महत्ता स्वीकारते हुए क्रमशः उन्हें सौन्दर्य के उपकारक तथा शब्दार्थ के शोभातिशायी धर्म कहा है।
संसार के अधिकांश कवियों ने जिस भाषा विषयक प्रवृत्ति का अनुकरण किया है, वह प्रवृत्ति है

A

परिमार्जित होती है और दूसरी अपरिमार्जित।

B

धर्मग्रन्थों में प्रयुक्त होती है और दूसरी लोककथाओं में।

C

आदर्शों पर आधारित होती है और दूसरी कल्पना पर।

D

अलौकिक होती है और दूसरी लौकिक।

लिखित उत्तर

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