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उषा सुनहले तीर बरसती जयलक्ष्मी-सी उदित ह...

उषा सुनहले तीर बरसती जयलक्ष्मी-सी उदित हुई,
उधर पराजित काल रात्रि भी जल में अंतर्निहित हुई।
वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का आज लगा हँसने फिर से,
वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में शरद-विकास नये सिर से।
नव कोमल आलोक बिखरता हिम-संसृति पर भर अनुराग,
सित सरोज पर क्रीड़ा करता जैसे मधुमय पिंग पराग।
धीरे-धीरे हिम-आच्छादन हटने लगा धरातल से,
जगी वनस्पतियाँ अलसाई मुख धोती शीतल जल से।
नेत्र निमीलन करती मानो प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने,
जलधि लहरियों की अंगड़ाई बार-बार जाती सोने।
सिंधुसेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी,
प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये सी ऐंठी-सी।
देखा मनु ने वह अविजित विजन का नव एकांत
जैसे कोलाहल सोया हो हिम-शीतल-जड़ता-सा श्रांत।
इंद्रनीलमणि महा चषक सोम-रहित उलटा लटका,
आज पवन मृदु साँस ले रहा जैसे बीत गया खटका।
प्रस्तुत कविता की सभी पंक्तियों में कौन-सा भाव निहित है?

A

विध्वंस का

B

सृजन का

C

आलस का

D

चिंता का

Text Solution

Verified by Experts

The correct Answer is:
B

कविता की सभी पंक्तियों में सृजन का भाव निहित है, जैसे- उषा का उदय होना, रात्रि का छिपना, प्रकृति का हँसना इत्यादि।
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