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गुलजार जी. क्या लिखते समय पाठक आपके चिन्...

गुलजार जी. क्या लिखते समय पाठक आपके चिन्तन में होते हैं ? देखिए, जब मैं लिखता हूँ, मेरे जेहन में मैं होता हूँ। मैं पहले यही तय करता हूँ। बात मुझे अपनी कहनी होती है।पाठक को सामने रखकर लिखने का कोई मतलय नहीं होता। दूसरी महत्वपूर्ण बात मैं महसूस करता हूँ वह है कम्युनिकेशन ...... .. अपनी बात को पाठक तक पहुँचाना.... आर्ट ऑफ कम्युनिकेशन.... हाँ मैं अपने लेखन को इस कसौटी पर रखता है। मीडिया से जुड़े होने के कारण कहने , के तरीके को लेकर मै सोचता अवश्य हँ। विषय. मेरे होते हैं, मेरी बात सही है या नहीं। आप अपनी ग्रोथ के साथ एक अहाता बनाते चलते हैं। हर फाइन आर्ट लोगों तक पहँचनी ही चाहिए। सगीत हो, कला हो या लेखन हो वो अपने लक्ष्य तक पहुँचनी चाहिए, कहने का ऐसा तरीका तो होना ही चाहिए।
गुलजार के अनुसार लिखने वाले के जेहन में स्वयं लेखक होता है। इसका आशय यह है कि

A

लेखक पाठक की उपेक्षा करता है

B

लेखक को अपनी ग्रोथ चाहिए

C

लेखक की संवेदनाएँ, आत्मानुभूति केन्द्र में होती है

D

लेखक स्वयं को सर्वोपरि मानता है।

लिखित उत्तर

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