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कवि कविता का प्रधान धर्म मनोरंजन और प्रभ...

कवि कविता का प्रधान धर्म मनोरंजन और प्रभावोत्पादकता न हो तो उसका होना निष्फल ही समझना चाहिये। पद्य में काफिए वगैरह की जरूरत हैं, कविता के लिए नहीं। कविता के लिए तो ये बातें एक प्रकार से उल्टी हानिकारक हैं। तले हुए शब्दों में कविता करने और तुक, अनुप्राप्त आदि ढूँढने से कवियों के विचार-स्वातन्त्रय में बड़ी बाधा आती हैं। पद्य के नियम कवि के लिए एक प्रकार की बेड़ियाँ हैं। उनसे जकड़ जाने से कवियों को अपनी स्वाभाविक उड़ान में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता हैं। कवि का काम हैं कि वह अपने मनोभावो को स्वाधीनतापूर्वक प्रकट करें। पर काफिए और वजन उसकी स्वाधीनता में विघ्न डालते हैं। वे उसे अपने भावों को स्वतंत्रता से प्रकट नहीं करने देते। काफिये और जवन को पहले ढूंढकर कवि को अपने मनोभाव तदनुकूल गढ़ने पड़ते हैं। इसका मतलब वह हुआ कि प्रधानता को प्रधानता प्राप्त हो जाती हैं,और एक बहुत ही गौण बात प्रधानता के आसन पर जा बैठती हैं। फल यह होता हैं कि कवि की कविता का असर ही जाता रहता हैं।
जीवन का विलोम हैं

A

अव्ययीभाव

B

तत्पुरूष

C

कर्मधारय

D

बहुव्रीहि

लिखित उत्तर

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