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भारतीय साहित्य का आदर्श उसका त्याग और उत...

भारतीय साहित्य का आदर्श उसका त्याग और उत्सर्ग है। यूरोप का कोई व्यक्ति लखपति होकर, जायदाद खरीदकर, कम्पनियों में हिस्से लेकर और ऊँची सोसायटी में मिलकर अपने को कृतकार्य समझता है। भारत अपने को उस समय कुतकार्य समझता है, जब वह इस माया-बंध से मुक्त हो जाता है, जब उसमें भोग और सम्पत्ति उसके साहित्यिक आदर्श होते हैं । व्यास और वाल्मीकि ने जिन आदर्शों की सृष्टि की, वह आज भी भारत का सिर ऊँचा किये हए हैं। राम अगर वाल्मीकि के साँचे में न ढलते, तो राम न रहते । सीता भी उसी साँचे में ढल कर सीता हुई। यह सत्य है कि हम सब ऐसे चरित्रों का निर्माण नहीं कर सकते, पर एक धन्वन्तरि के होने पर भी संसार मे वैद्यों की आवश्यकता रही है और रहेगी। ऐसा महान् दायित्व जिस पर है, उसके निर्माताओं का पद कुछ कम .. जिम्मेदारी का नहीं है। कलम हाथ में लेते ही हमारे सिर पर बड़ी भारी जिम्मेदारी आ जाती है। साधारणतः युवावस्था में हमारी निगाह पहले विध्वंस करने की ओर उठ जाती है। हम सुधार करने की धुन में अंधाधुंध शर चलाना शुरू करते हैं। खुदाई। फौजदार बन जाते हैं परन्तु आँखें काले धब्बों की ओर पहुँच जाती है। यथार्थवाद के प्रवाह में बहने लगते हैं। बुराइयों के नग्न चित्र खींचने में कला की कृतकार्यता समझते हैं। यह सत्य है कि कोई मकान गिराकर ही उसकी जगह नया मकान बनाया जाता है। पुराने ढकोसलों और बंधनों को तोड़ने की जरूरत है। पर इसे साहित्य नहीं कह सकते है। साहित्य तो वही है, जो साहित्य की मर्यादाओं का पालन करे।
तत्सम शब्द नहीं है

A

उच्च

B

हस्त

C

नव्य

D

आँख

लिखित उत्तर

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