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प्राचीन भारत का इतिहास - परिचय |सिंधु घा...

प्राचीन भारत का इतिहास - परिचय |सिंधु घाटी सभ्यता |ऋग्वेद काल और उत्तरवैदिक काल |ऐतिहासिक काल |मगध पर शासन करने वाले राजवंश |मौर्य राजवंश व उसके शाषक |कलिंग का युद्ध |अशोक का धर्म व् धर्म यात्रा

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प्राचीन भारत के इतिहास के काल |मगध व् उसपर शासन करने वाले राजवंश |मौर्य राजवंश व् उसके शासक |कलिंग का युद्ध |अशोक का धर्म व् धर्म यात्रा

प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?

प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। वैदिक काल में निम्नलिखित में से किस विषय की शिक्षा दी जाती थी?

प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। वेदत्रयी के अन्तर्गत निम्नलिखित में से किसे शामिल नहीं किया जाता है?

प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। वायु पुराण में निम्नलिखित में से किस विषय को शामिल नहीं किया गया है?

प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। मनु के अनुसार वैश्यों को निम्नलिखित में से किस विषय की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए?

प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। प्रस्तुत गद्यांश में निम्नलिखित में से किस विषय का उल्लेख नहीं किया गया है?

प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। काव्यशास्त्र में कौन-सा समास है?

प्राचीन भारत में शिक्षा को ज्ञान प्राप्ति का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता था। व्यक्ति के जीवन को सन्तुलित और श्रेष्ठ बनाने तथा एक नई दिशा प्रदान करने में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान था। सामाजिक बुराइयों को उसकी जड़ों से निर्मूल करने और त्रुटिपूर्ण जीवन में सुधार करने के लिए शिक्षा की नितान्त आवश्यकता थी। यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन ही परिवर्तित किया जा सकता था। व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का, विकास करने, वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करने और अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए शिक्षा पर निर्भर होना पड़ता था। आधुनिक युग की भाँति प्राचीन भारत में भी मनुष्य के चरित्र का उत्थान शिक्षा से ही सम्भव था। सामाजिक उत्तरदायित्वों को निष्ठापूर्वक वहन करना प्रत्येक मानव का परम उद्देश्य माना जाता है। इसके लिए भी शिक्षित होना अनिवार्य है। जीवन की वास्तविकता को समझने में शिक्षा का उल्लेखनीय योगदान रहता है। भारतीय मनीषियों ने इस ओर अपना ध्यान केन्द्रित करके शिक्षा को समाज की आधारशिला के रूप में स्वीकार किया। विद्या का स्थान किसी भी वस्तु से बहुत ऊँचा बताया गया। प्रखर बुद्धि एवं सही विवेक के लिए शिक्षा की उपयोगिता को स्वीकार किया गया। यह माना गया कि शिक्षा ही मनुष्य को व्यावहारिक कर्तव्यों का पाठ पढ़ाने और सफल नागरिक बनाने में सक्षम है। इसके माध्यम से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अर्थात् सर्वांगीण विकास सम्भव है। शिक्षा ने ही प्राचीन संस्कृति को संरक्षण दिया और इसके प्रसार में मदद की। विद्या का आरम्भ 'उपनयन संस्कार' द्वारा होता था। उपनयन संस्कार के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए मनुस्मृति में उल्लेख मिलता है कि गर्भाधान संस्कार द्वारा तो व्यक्ति का शरीर उत्पन्न होता है पर उपनयन संस्कार द्वारा उसका आध्यात्मिक जन्म होता है। प्राचीन काल में बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आचार्य के पास भेजा जाता था। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, जो ब्रहाचर्य ग्रहण करता है। वह लम्बी अवधि की यज्ञावधि ग्रहण करता है। छान्दोग्योपनिषद् में उल्लेख मिलता है कि आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्मचारी रूप से वेदाध्ययन के लिए गुरु के पास जाने को प्रेरित किया था। आचार्य के पास रहते हुए ब्रह्मचारी को तप और साधना का जीवन बिताते हुए विद्याध्ययन में तल्लीन रहना पड़ता था। इस अवस्था में बालक जो ज्ञानार्जन करता था उसका लाभ उसको जीवन भर मिलता था। गुरु गृह में निवास करते हुए विद्यार्थी समाज के निकट सम्पर्क में आता था। गुरु के लिए समिधा, जल का लाना तथा गृह-कार्य करना उसका कर्तव्य माना जाता था। गृहस्थ धर्म की शिक्षा के साथ-साथ वह श्रम और सेवा का पाठ पढ़ता था। शिक्षा केवल सैद्धान्तिक और पुस्तकीय न होकर जीवन की वास्तविकताओं के निकट होती थी। प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से कौन-सा हो सकता है?