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बिहारी के दोहों के आलोक में ग्रीष्म ऋतु ...

बिहारी के दोहों के आलोक में ग्रीष्म ऋतु की प्रचंडता और प्रभाव का विस्तृत चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।

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बिहारी जी ने अपने दोहों के माध्यम से ज्येष्ठ मास की भयंकर गर्मी का वर्णन किया है। गर्मी में सूर्य के प्रचंड ताप से पूरी पृथ्वी जल रही है। दोपहर के समय जब सूर्य आसमान में बीचों-बीच होता है तब कहीं भी छाया दिखाई नहीं देती। मार्ग सूने और राहगीर विहीन हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि मानो छाया भी गर्मी से बेहाल होकर सघन वन अथवा घर में चली गई हो। तेज गर्मी के कारण जंगल में स्थित जल-स्रोतों में पानी सूख जाता है और सभी जीव-जन्तु व्याकुल हो जाते हैं। भीषण गर्मी के कारण सभी जीव-जंतु आपसी बैरभाव को भूल जाते हैं। कहीं कोई बैर-वैमनस्य का भाव दिखाई नहीं देता। मोर, साँप, बाघ, हिरण जैसे स्वाभाविक बैरी भी शत्रुता भूलकर एकता, सद्भावना और प्रेम के साथ रह रहे हैं जिससे धरती तपोवन के समान प्रतीत होती है।
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