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"बुरे लोगों की संगति थोड़े समय में अपना ...

"बुरे लोगों की संगति थोड़े समय में अपना प्रभाव डाल देती है और हमारे जीवन की पवित्रता नष्ट कर देती है।" ये वाक्य का कौन सा प्रकार है?

A

सरल वाक्य

B

संयुक्त वाक्य

C

मिश्र वाक्य

D

सरल व मिश्र वाक्य

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The correct Answer is:
D
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निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये बाल्यावस्था में हम शीघ्र ही सबकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं और मित्र बना लेते हैं। हमारा मन अनेक कल्पनाओं से भरा रहता है। युवावस्था की मित्रता सहपाठी की मित्रता से अधिक दृढ़ शांत और गंभीर होती है। सच्चा मित्र वही है जो दृढ़-चित्त और सत्य-संकल्प का हो। अपने से अधिक आत्म-बल वाले व्यक्ति से मित्रता करना उचित है। क्योंकि वह महान कार्यों में हमारा मनोबल बढ़ाता है। सम्मानित, शुद्ध ह्दयी, कोमल, मेहनती, शिष्ट और सत्यनिष्ठ व्यक्ति पर हम पूरा विश्वास कर मित्रता कर सकते हैं। उससे धोखे की उम्मीद नहीं रहती। ऐसे जान-पहचान वालों से दूर रहना चाहिए जो न कोई बुद्धिमानी या हँसी-मजाक की बात कर सकते हैं और न दुःख के क्षण में सहानुभूति दिखला सकते हैं। मनुष्य को बुरी संगति करने से बचना चाहिए। नीति और सवृत्ति दोनों का नाश होने में देर नहीं लगती और व्यक्ति दिनोंदिन अवनति के गड्ढे में गिरता जाता है। उसका आध्यात्मिक विकास रूक जाता है। बुरे लोगों की संगति थोड़े समय में अपना प्रभाव डाल देती है और हमारे जीवन की पवित्रता नष्ट कर देती है। अतः अश्लील, अपवित्र और फूहड़ बातें करने वालों से दूर रहना चाहिए। सच्चा मित्र जीवन में किस प्रकार सहायक है?

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये बाल्यावस्था में हम शीघ्र ही सबकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं और मित्र बना लेते हैं। हमारा मन अनेक कल्पनाओं से भरा रहता है। युवावस्था की मित्रता सहपाठी की मित्रता से अधिक दृढ़ शांत और गंभीर होती है। सच्चा मित्र वही है जो दृढ़-चित्त और सत्य-संकल्प का हो। अपने से अधिक आत्म-बल वाले व्यक्ति से मित्रता करना उचित है। क्योंकि वह महान कार्यों में हमारा मनोबल बढ़ाता है। सम्मानित, शुद्ध ह्दयी, कोमल, मेहनती, शिष्ट और सत्यनिष्ठ व्यक्ति पर हम पूरा विश्वास कर मित्रता कर सकते हैं। उससे धोखे की उम्मीद नहीं रहती। ऐसे जान-पहचान वालों से दूर रहना चाहिए जो न कोई बुद्धिमानी या हँसी-मजाक की बात कर सकते हैं और न दुःख के क्षण में सहानुभूति दिखला सकते हैं। मनुष्य को बुरी संगति करने से बचना चाहिए। नीति और सवृत्ति दोनों का नाश होने में देर नहीं लगती और व्यक्ति दिनोंदिन अवनति के गड्ढे में गिरता जाता है। उसका आध्यात्मिक विकास रूक जाता है। बुरे लोगों की संगति थोड़े समय में अपना प्रभाव डाल देती है और हमारे जीवन की पवित्रता नष्ट कर देती है। अतः अश्लील, अपवित्र और फूहड़ बातें करने वालों से दूर रहना चाहिए। लेखक कहता है कि हमें बुरी संगति से दूर रहना चाहिए। क्योंकि

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये बाल्यावस्था में हम शीघ्र ही सबकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं और मित्र बना लेते हैं। हमारा मन अनेक कल्पनाओं से भरा रहता है। युवावस्था की मित्रता सहपाठी की मित्रता से अधिक दृढ़ शांत और गंभीर होती है। सच्चा मित्र वही है जो दृढ़-चित्त और सत्य-संकल्प का हो। अपने से अधिक आत्म-बल वाले व्यक्ति से मित्रता करना उचित है। क्योंकि वह महान कार्यों में हमारा मनोबल बढ़ाता है। सम्मानित, शुद्ध ह्दयी, कोमल, मेहनती, शिष्ट और सत्यनिष्ठ व्यक्ति पर हम पूरा विश्वास कर मित्रता कर सकते हैं। उससे धोखे की उम्मीद नहीं रहती। ऐसे जान-पहचान वालों से दूर रहना चाहिए जो न कोई बुद्धिमानी या हँसी-मजाक की बात कर सकते हैं और न दुःख के क्षण में सहानुभूति दिखला सकते हैं। मनुष्य को बुरी संगति करने से बचना चाहिए। नीति और सवृत्ति दोनों का नाश होने में देर नहीं लगती और व्यक्ति दिनोंदिन अवनति के गड्ढे में गिरता जाता है। उसका आध्यात्मिक विकास रूक जाता है। बुरे लोगों की संगति थोड़े समय में अपना प्रभाव डाल देती है और हमारे जीवन की पवित्रता नष्ट कर देती है। अतः अश्लील, अपवित्र और फूहड़ बातें करने वालों से दूर रहना चाहिए। लेखक इस गद्यांश में सच्ची मित्रता की परिभाषित करता है कि

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये बाल्यावस्था में हम शीघ्र ही सबकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं और मित्र बना लेते हैं। हमारा मन अनेक कल्पनाओं से भरा रहता है। युवावस्था की मित्रता सहपाठी की मित्रता से अधिक दृढ़ शांत और गंभीर होती है। सच्चा मित्र वही है जो दृढ़-चित्त और सत्य-संकल्प का हो। अपने से अधिक आत्म-बल वाले व्यक्ति से मित्रता करना उचित है। क्योंकि वह महान कार्यों में हमारा मनोबल बढ़ाता है। सम्मानित, शुद्ध ह्दयी, कोमल, मेहनती, शिष्ट और सत्यनिष्ठ व्यक्ति पर हम पूरा विश्वास कर मित्रता कर सकते हैं। उससे धोखे की उम्मीद नहीं रहती। ऐसे जान-पहचान वालों से दूर रहना चाहिए जो न कोई बुद्धिमानी या हँसी-मजाक की बात कर सकते हैं और न दुःख के क्षण में सहानुभूति दिखला सकते हैं। मनुष्य को बुरी संगति करने से बचना चाहिए। नीति और सवृत्ति दोनों का नाश होने में देर नहीं लगती और व्यक्ति दिनोंदिन अवनति के गड्ढे में गिरता जाता है। उसका आध्यात्मिक विकास रूक जाता है। बुरे लोगों की संगति थोड़े समय में अपना प्रभाव डाल देती है और हमारे जीवन की पवित्रता नष्ट कर देती है। अतः अश्लील, अपवित्र और फूहड़ बातें करने वालों से दूर रहना चाहिए। बाल्यावस्था में बालक का मन

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये बाल्यावस्था में हम शीघ्र ही सबकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं और मित्र बना लेते हैं। हमारा मन अनेक कल्पनाओं से भरा रहता है। युवावस्था की मित्रता सहपाठी की मित्रता से अधिक दृढ़ शांत और गंभीर होती है। सच्चा मित्र वही है जो दृढ़-चित्त और सत्य-संकल्प का हो। अपने से अधिक आत्म-बल वाले व्यक्ति से मित्रता करना उचित है। क्योंकि वह महान कार्यों में हमारा मनोबल बढ़ाता है। सम्मानित, शुद्ध ह्दयी, कोमल, मेहनती, शिष्ट और सत्यनिष्ठ व्यक्ति पर हम पूरा विश्वास कर मित्रता कर सकते हैं। उससे धोखे की उम्मीद नहीं रहती। ऐसे जान-पहचान वालों से दूर रहना चाहिए जो न कोई बुद्धिमानी या हँसी-मजाक की बात कर सकते हैं और न दुःख के क्षण में सहानुभूति दिखला सकते हैं। मनुष्य को बुरी संगति करने से बचना चाहिए। नीति और सवृत्ति दोनों का नाश होने में देर नहीं लगती और व्यक्ति दिनोंदिन अवनति के गड्ढे में गिरता जाता है। उसका आध्यात्मिक विकास रूक जाता है। बुरे लोगों की संगति थोड़े समय में अपना प्रभाव डाल देती है और हमारे जीवन की पवित्रता नष्ट कर देती है। अतः अश्लील, अपवित्र और फूहड़ बातें करने वालों से दूर रहना चाहिए। मित्रता अधिक गम्भीर तथा स्थायी होती है।

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये बाल्यावस्था में हम शीघ्र ही सबकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं और मित्र बना लेते हैं। हमारा मन अनेक कल्पनाओं से भरा रहता है। युवावस्था की मित्रता सहपाठी की मित्रता से अधिक दृढ़ शांत और गंभीर होती है। सच्चा मित्र वही है जो दृढ़-चित्त और सत्य-संकल्प का हो। अपने से अधिक आत्म-बल वाले व्यक्ति से मित्रता करना उचित है। क्योंकि वह महान कार्यों में हमारा मनोबल बढ़ाता है। सम्मानित, शुद्ध ह्दयी, कोमल, मेहनती, शिष्ट और सत्यनिष्ठ व्यक्ति पर हम पूरा विश्वास कर मित्रता कर सकते हैं। उससे धोखे की उम्मीद नहीं रहती। ऐसे जान-पहचान वालों से दूर रहना चाहिए जो न कोई बुद्धिमानी या हँसी-मजाक की बात कर सकते हैं और न दुःख के क्षण में सहानुभूति दिखला सकते हैं। मनुष्य को बुरी संगति करने से बचना चाहिए। नीति और सवृत्ति दोनों का नाश होने में देर नहीं लगती और व्यक्ति दिनोंदिन अवनति के गड्ढे में गिरता जाता है। उसका आध्यात्मिक विकास रूक जाता है। बुरे लोगों की संगति थोड़े समय में अपना प्रभाव डाल देती है और हमारे जीवन की पवित्रता नष्ट कर देती है। अतः अश्लील, अपवित्र और फूहड़ बातें करने वालों से दूर रहना चाहिए। प्रस्तुत गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक बताइये।

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