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BIOLOGY
रक्त के संगठित पदार्थो के अवयवों का वर्ण...

रक्त के संगठित पदार्थो के अवयवों का वर्णन कीजिए तथा प्रत्येक अवयव के एक प्रमुख कार्य के बारे में लिखिए|

लिखित उत्तर

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रक्त के संगठित पदार्थों के अवयव निम्नलिखित हैं -
(1) लाल रुधिर कोशिकाएँ (RBC), (2) श्वेत रुधिर कणिकाएँ (WBC), (3) प्लेटलेट्स (थ्रोम्बोसाइट)।
(1) लाल रुधिर कोशिकाएँ (RBC)इन्हें इरिथोसाइट (Erythrocyte) भी कहते हैं। इनकी संख्या बहुत अधिक होती है। कुल रुधिर कणिकाओं में से लगभग 99 प्रतिशत होती हैं। इनका व्यास 7 से 8 um तथा मोटाई लगभग 2 um होती है। ये आकार में वृत्ताकार, डिस्करूपी उभयावतल (Biconcave) एवं केन्द्रक रहित होती हैं। वयस्क पुरुष में इनकी संख्या लगभग 50-55 लाख प्रति घन मिमी. और महिला में लगभग 45 लाख प्रति घन मिमी. होती है। लाल रुधिर कोशिकाओं में केन्द्रक का अभाव होता है। इनमें श्वसन वर्णक हीमोग्लोबिन होता है। लाल रुधिर कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन परिधि की ओर होता है। इन कोशिकाओं का रंग हल्का पीला होता है, किन्तु जब समूह में होती हैं तब लाल रंग की दिखाई देती हैं। लाल रुधिर कोशिकाओं का जीवन काल 120 दिन तक का होता है तथा इस आयु के बाद ये निष्क्रिय हो जाती हैं। इन निष्क्रिय लाल रुधिर कणिकाओं का भक्षण यकृत तथा प्लीहा की भक्षिकाकोशिकायें (Phagocytes) निरन्तर करती रहती हैं। RBC का भ्रूणावस्था में निर्माण प्लीहा द्वारा होता है। परन्तु वयस्कावस्था में इनका निर्माण अस्थियों की लाल अस्थि मज्जा (Red Bone Marrow) में निरन्तर होता रहता है।
लाल रुधिर कणिकाओं के कार्य-
(1) ये ऑक्सीजन को फेफड़ों से ऊतकों तक पहुँचाती हैं।
(2) ये कार्बन डाइऑक्साइड का कोशिकाओं से फेफड़ों तक संवहन भी करती हैं।
(2) श्वेत रुधिर कणिकाएँ (White Blood Cells)-ये लाल रुधिर कोशिकाओं की अपेक्षा बड़े अनियमित (Irregular) एवं परिवर्तनशील आकार (Changeable Shape) के परन्तु संख्या में बहुत कम, रंगहीन एवं केन्द्रकीय (Nucleated) होते हैं। केन्द्रक की उपस्थिति के कारण इन्हें वास्तविक कोशिकायें (True Cells) कहते हैं। इनका जीवन काल कुछ दिन से कुछ सप्ताह होता है। इन्हें ल्यूकोसाइट भी कहते हैं। इनका निर्माण भी अस्थि मज्जा, यकृत व प्लीहा में होता है। वयस्क मनुष्य में इनकी संख्या लगभग 6000-8000 प्रति घन मिमी. होती है। अमीबीय गति इनका विशिष्ट लक्षण है।
श्वेत रुधिर कणिकाओं को रचना के आधार पर दो श्रेणियों में बाँटा गया है -
(i) कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes)
(ii) कणिकाविहीन श्वेत रक्ताणु (Agranulocytes) (i) कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes)-इनके - कोशिका द्रव्य में विशिष्ट अभिरंजक ग्रहण करने वाली अनेक कणिकाएँ पाई जाती हैं इसलिए इन्हें कणिकामय श्वेत रक्ताणु (Granulocytes) कहते हैं|
इन कोशिकाओं को अभिरंजक (Stain) के प्रति धनात्मक सक्रियता के आधार पर निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है-
(a) न्यूट्रोफिल्स (Neutrophils)-कणिकामय श्वेत रुधिराणुओं में इनकी संख्या सबसे अधिक होती है। इनका केन्द्रक 2-7 पिण्डों में बँटा होता है जो एक सूत्र द्वारा जुड़े रहते हैं। इसलिये इन्हें पॉलीमारफोन्यूक्लिअर ल्यूकोसाइट्स (Polymorphonuclear leucocytes) भी कहते हैं। कुल श्वेताणु की संख्या का लगभग 62% न्यूट्रोफिल होती हैं।

ये उदासीन अभिरंजक (Neutral Stain) द्वारा अभिरंजित की जाती हैं।
(b) इओसिनोफिल्स (Eosinophills)-इनके कोशिका द्रव्य में अम्लीय अभिरंजक (Acidic Dye) जैसे इओसीन (Eosin) ग्रहण करने वाले कण पाये जाते हैं । इनका केन्द्रक दो पालियों में विभक्त होता है। इनमें एन्टीहिस्टामिनिक गुण पाया जाता है।
यह संक्रमण से बचाव करती है तथा एलर्जी प्रतिक्रिया में सम्मिलित रहती है।
(c) बेसोफिल्स (Basophills)-इनके कोशिका द्रव्य में अधिक बड़ी कणिकाएँ परन्तु संख्या में कम होती हैं। इनका केन्द्रक 2-3 पिण्डों में बँटा होता है। ये क्षारीय अभिरंजक (Basic Stain) जैसे मैथाइलीन ब्लू (Methylene Blue), हिमेटॉक्सलिन को ग्रहण करती हैं। ये हिस्टामिन सिरोटोनिन एवं हिपेरिन उत्पन्न करती हैं। ये कुल श्वेताणु संख्या का 0.5% होती हैं।
(ii) कणिकाविहीन श्वेत रक्ताणु (Agranulocytes)-इनके कोशिका द्रव्य में कणिकाएँ अनुपस्थित होती हैं। इनमें सिर्फ एक केन्द्रक होता है जो गोलाकार होता है। एक केन्द्रक होने के कारण इन्हें मोनोन्यूक्लिअर श्वेताणु (Mononuclear Leucocytes) कहते हैं।
परिमाण के आधार पर ये दो प्रकार की होती हैं
(a) एक केन्द्रकाणु (Monocytes)-ये परिमाण में तुलनात्मक बड़ी होती हैं परन्तु केन्द्रक अपेक्षाकृत छोटा होता है। साइटोप्लाज्म की मात्रा लिम्फोसाइट्स से अधिक होती है। केन्द्रक ऐसेन्ट्रिक होता है।
(b) लसीकाणु (Lymphocytes)-ये परिमाण में अपेक्षाकृत छोटी होती हैं तथा केन्द्रक प्रायः गोलाकार तथा बड़ा होता है जो केन्द्र में स्थित होता है। कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) की मात्रा कम होती है। ये दो प्रकार की होती है-
(i) बी-लिम्फोसाइट (ii) टी-लिम्फोसाइट।
दोनों प्रकार की लिम्फोसाइट शरीर की प्रतिरक्षा के लिए उत्तरदायी
श्वेत रक्ताणुओं के कार्य-
(1) ये आसंजन गुण के कारण रक्तवाहिनियों की एण्डोथिलियल लाइनिंग (Endothelial Lining) को सुरक्षा प्रदान करती हैं।
(2) ये फेगोसाइटिक एक्शन करती हैं।
(3) ये एण्टीटॉक्सिन का निर्माण करती हैं।
(4) एन्टीबाडीज बनाती हैं।
(3)रुधिर पट्टिकाणु (Blood Platelets)-ये विशिष्ट प्रकार की कणिकाएँ स्तनियों के रक्त में पायी जाती हैं। इनकी आकृति गोलाकार या अण्डाकार अथवा शलाका के समान होती है। ये रंगहीन होती हैं। इनमें केन्द्रक अनुपस्थित रहता है परन्तु जीवद्रव्य व कणिकाएँ पाई जाती हैं। इनका व्यास 2-4um होता है तथा रक्त कणिकाओं में सबसे छोटी तथा जीवनकाल 5-7 दिन तक होता है। इनका उत्पादन मेगाकेरियोसाइट्स (Megakaryocytes) द्वारा लाल अस्थि मज्जा में होता है।
रुधिर पट्टिकाणु को थोम्बोसाइट भी कहते हैं।
कार्य-
(1) रक्त स्कन्दन (Clotting) में सहायता करती हैं जिससे रक्तवाहिनी के कटे भाग से रक्तस्राव बन्द हो जाता है।
(2) शरीर के अन्दर यदि किसी कारण, रक्तवाहिनी से रक्त निकलने लग जाये तो प्लेटलेट्स परस्पर चिपककर डाट की भाँति उसे बन्द कर देती हैं। ऐसे डाट को थॉम्बस (Thrombus) कहते हैं।
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