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रेटिना

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रेटिना या दृष्टि पटल (Retina)-यह नेत्र गोलक की भित्ति का सबसे भीतरी स्तर होता है । यह नेत्र गोलक के पश्च भाग में स्थित होता है एवं कोरॉएड स्तर को ढके रहता है। रेटिना दो प्रमुख स्तरों की बनी होती है-बाहर का रंगा स्तर (Pigment Layer) तथा भीतरी अपेक्षाकृत मोटा संवेदी स्तर (Sensory Layer)।
रंगा स्तर (Pigment Layer)-यह स्तर चपटी एवं रंगा कणिकायुक्त कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है। यह स्तर आइरिस की पुतली तक फैला होता है। संवेदी स्तर केवल सिलियरी काय तक फैला रहता है तथा बाहर से भीतर की ओर तीन परतों में बंटा होता है-
(1) प्रकाशग्राही कोशिका (Photoreceptor cells)-यह परत लम्बी-लम्बी संवेदी कोशिकाओं की बनी होती है। ये कोशिकाएँ परत में खड़ी स्थिति में होती हैं। परत की कोशिकाएँ दो प्रकार की होती है। इनमें से कुछ अपेक्षाकृत लम्बी होती हैं तथा रंगा स्तर से लगी रहती हैं, इन्हें शलाकायें (Rods) कहते हैं। इसके विपरीत अधिकांश कोशिकाएँ अपेक्षाकृत चौड़ी तथा कुछ चपटी होती हैं तथा इनके नुकीले सिरे रंगा स्तर तक पहुँच नहीं पाते हैं। इन्हें शंकु (Cones) कहते हैं।
प्रत्येक शलाका एवं शंकु का भीतरी सिरा पतला होकर एक महीन तन्त्रिका तन्तु में विभेदित होता है जो शीघ्र शाखान्वित होकर इस स्तर की दूसरी परत के तन्तुओं से साइनेप्सीस बनाता है। शलाकाओं (Rods) द्वारा प्रकाश एवं अन्धकार के भेद का ज्ञान होता है। इसके विपरीत शंकुओं (Cones) द्वारा रंगभेद का ज्ञान होता है। इस परत की कोशिकाओं में भी कुछ कणिकाएँ होती हैं।
(2) द्विधुवीय तन्त्रिका कोशिका परत (Bipolar Neuronic Layer)-द्विध्रुवीय न्यूरॉन की परत अनेक द्विध्रुवीय (Bipolar) तन्त्रिका कोशिकाओं की बनी होती है। इन न्यूरॉन के डैण्ड्राइट (Dendrites) शलाकाओं एवं शंकुओं के तन्तुओं से अनेक साइनेप्सीस बनाते हैं। इसी प्रकार इन तन्त्रिका कोशिकाओं के एक्सॉन (Axons) संवेदी स्तर की तीसरी गुच्छिकीय परत के तन्त्रिका तन्तुओं से साइनेप्सीस (Synapses) बनाते हैं।
(3) गुच्छिकीय परत (Ganglionic Layer)-यह परत भी द्विध्रुवीय न्यूरॉन की बनी होती है। परन्तु यहाँ तन्त्रिका कोशिकाएँ अपेक्षाकृत बड़ी होती हैं। इन न्यूरॉन के बाहर डैण्ड्राइट ऊपरी परत के एक्सॉन से साइनेप्सीस (Synapses) बनाते हैं तथा भीतरी अपेक्षाकृत लम्बे एक्सॉन नेत्र-गोलक के आधार भाग में केन्द्रित होकर दृक-तन्त्रिका (Optic Nerve) के तन्तुओं में स्वयं परिवर्तित हो जाते हैं तथा गोलक को बंध कर बाहर निकलते हैं। इस आधार भाग को अन्ध बिन्दु (Blind Spot) कहते हैं, क्योंकि इस स्थान पर गोलक की परतों का अभाव होता है तथा यह भाग प्रतिबिम्ब बनाने में सहयोग नहीं देता है।
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