एपिथीलियम ऊतक-ये ऊतक जन्तु की बाहरी सतह तथा आंतरिक गुहाओं का आवरण बनाते हैं। ये विभिन्न आकृति तथा माप के होते हैं। कार्य के आधार पर इनको निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है-
(i) शल्की एपिथीलियम-कोशिकाओं में रक्त नलिका अस्तर या कूपिका जहाँ पदार्थों का संवहन वर्णात्मक पारगम्य झिल्ली द्वारा होता है, वहाँ पर चपटी एपिथीलियम ऊतक कोशिकाएँ होती हैं। ये अत्यधिक पतली और चपटी होती हैं तथा कोमल स्तर का निर्माण करती हैं । आहार नली तथा मुँह का अस्तर इनके द्वारा बना होता है। शरीर की त्वचा का निर्माण भी शल्की एपिथीलियम द्वारा ही होता है।
(ii) स्तरित शल्की एपिथीलियम-त्वचा की एपिथीलियम कोशिकाएँ इनको कटने तथा फटने से बचाने के लिए कई परतों में व्यवस्थित रहती हैं, इसलिए इसे स्तरित शल्की एपिथीलियम कहते हैं।
(iii) स्तम्भाकार-अवशोषण वाले भाग और स्राव करने वाले भाग में स्तम्भाकार एपिथीलियम कोशिकाएँ होती हैं, जैसे-छोटी आँत। यह एपिथीलियमी अवरोध को पार करने में सहायता करता है।
(iv) पक्ष्माभी स्तम्भाकार एपिथीलियम-श्वास नली में, स्तम्भाकार एपिथीलियम ऊतक में पक्ष्माभ होते हैं, जो कि बाल जैसी संरचना होती है। ये पक्ष्माभ गति कर सकते हैं तथा इनकी गति श्लेष्मा को आगे स्थानान्तरित करके साफ करने में सहायता करती है। इस प्रकार का एपिथीलियम, पक्ष्माभी स्तम्भाकार एपिथीलियम कहलाता है।
(v) घनाकार-वृक्कीय नली एवं लार ग्रन्थि के अस्तर का निर्माण घनाकार एपिथीलियम कोशिकाओं से होता है । इस प्रकार ये कोशिकाएँ उस भाग को यांत्रिक सहारा प्रदान करती हैं।
(vi) ग्रन्थिल एपिथीलियम-कभी-कभी एपिथीलियम ऊतक का कुछ भाग अंदर की ओर मुड़ा होता है तथा एक बहुकोशिक ग्रन्थि का निर्माण करता है। यह ग्रन्थिल एपिथीलियम कहलाता है।
