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BIOLOGY
रोग की अंग-विशिष्ट तथा ऊतक-विशिष्ट अभिव्...

रोग की अंग-विशिष्ट तथा ऊतक-विशिष्ट अभिव्यक्ति से क्या आशय है ? स्पष्ट कीजिए।

लिखित उत्तर

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रोग की अंग-विशिष्ट तथा ऊतक-विशिष्ट अभिव्यक्ति से आशय है कि जिस ऊतक अथवा अंग पर सूक्ष्म जीव आक्रमण करता है, रोग के लक्षण तथा चिह्न भी उसी पर निर्भर करते हैं।
हमारे शरीर में रोग के सूक्ष्मजीव कई स्थानों से प्रवेश कर सकते हैं। वास्तव में सूक्ष्म जीव की विभिन्न स्पीशीज शरीर के विभिन्न भागों में विकसित होती है। यदि ये हवा से नाक द्वारा प्रवेश करते हैं, तो ये फेफड़ों में जाएंगे तथा यदि यह क्षय रोग का बैक्टीरिया है तो फेफड़े में क्षय रोग उत्पन्न करेगा। यदि मुंह द्वारा प्रवेश करते हैं तो ये आहार नाल में रहेंगे, जैसे-टायफाइड रोग उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया अथवा ये यकृत में जाएंगे जैसे हेपेटाइटिस बैक्टीरिया जो पीलिया रोग के वाहक हैं।
किन्तु हमेशा ऐसा नहीं है। HIV वायरस, जो लैंगिक अंगों द्वारा शरीर में प्रवेश करता है, लसीका ग्रन्थियों में फैलता है। मलेरिया उत्पन्न करने वाले सूक्ष्म जीव जो मच्छर के काटने से शरीर में प्रवेश करते हैं, वे यकृत में जाते हैं, उसके बाद लाल रुधिर कोशिकाओं में जाते हैं। इसी प्रकार जापानी मस्तिष्क ज्वरं उत्पन्न करने वाला वायरस भी मच्छर काटने से शरीर में पहुँचता है। लेकिन यह मस्तिष्क को संक्रमित करता है।
जिस ऊतक अथवा अंग पर सूक्ष्म जीव आक्रमण करता है, रोग के लक्षण तथा चिह्न उसी पर निर्भर करते हैं। यदि फेफड़े पर आक्रमण होता है तब लक्षण खाँसी तथा कम साँस आना होगा। यदि यकृत पर आक्रमण होता है तब पीलिया होगा। यदि मस्तिष्क पर आक्रमण होता है तब सिरदर्द, उल्टी आना, चक्कर अथवा बेहोशी आना होता है। यदि हम यह जानते हैं कि कौनसे ऊतक अथवा अंग पर आक्रमण हुआ है और उनके क्या कार्य हैं तो हम संक्रमण के चिह्न तथा लक्षण का अनुमान लगा सकते हैं।
कुछ विशेष संक्रमण में विशिष्ट ऊतक अति सामान्य प्रभाव दर्शाते हैं। जैसे HIV संक्रमण में वायरस प्रतिरक्षा तंत्र को प्रभावित करता है। यही कारण है कि HIV-AIDS से बहुत से प्रभाव परिलक्षित होते हैं क्योंकि हमारा शरीर प्रतिदिन होने वाले छोटे संक्रमणों का मुकाबला नहीं कर पाता है। हल्के से खाँसी-जुकाम से भी निमोनिया हो सकता है। इसी प्रकार आहार नाल के संक्रमण से रुधिर युक्त प्रवाहिका हो सकता है। अंततः ये अन्य संक्रमण ही HIVAIDS के रोगी की मृत्यु के कारण बनते हैं। रोग की तीव्रता की अभिव्यक्ति शरीर में स्थित सूक्ष्मजीवों की संख्या पर निर्भर करती है। यदि सूक्ष्मजीव अधिक संख्या में हैं तो रोग की अभिव्यक्ति तीव्र होगी। इसका निर्धारण हमारा प्रतिरक्षा तंत्र भी करता है।
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