फल

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Fresh fruit contains 68% water and dry fruit contains 20% water. How much dry fruit can be obtained from 100 kg of fresh fruit ताज़े फल में 68% पानी और सूखे फल में 20% पानी होता है | 100 किलो ग्राम ताज़े फल से कितने किलोग्राम सूखे फल प्राप्त किये जा सकते हैं ?

A crate of fruits contains one spoiled fruit for every 25 fruits. 60% of the spoiled fruits were sold. If the seller had sold 48 spoiled fruits, then the number of fruits in the crate were: फलों के एक टोकरे में हर 25 फलों पर एक खराब फल है। खराब हो चुके फलों के 60% की बिक्री हो गयी। यदि विक्रेता ने 48 खराब फलों की बिक्री की थी, तो टोकरे में फलों की संख्या थी:

कोमल किसलय के अंचल में नन्ही कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूलि के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली घरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का आँखों में पानी भरे हुए। नीरव निशीथ में लतिका-सी तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाँहे फैलाये-सी आलिंगन का जादू पढ़ती? किन इंद्रजाल के फूलों से लेकर सुहाग-कण-राग-भरे, सिर नीचा कर हो गूंथ माला जिससे मधु धार ढरे? पुलकित कदंब की माला-सी पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फल भरता के डर में। वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बुना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितना सौरभ से सना हुआ। सब अंग मोम से बनते हैं कोमलता में बल खाती हूँ. मैं सिमिट रही-सी अपने में परिहास-गीत सुन पाती हूँ। स्मित बन जाती है तरल हँसी नयनों में भरकर बाँकपना, प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो वह बनता जाता है सपना। प्रस्तुत कविता में नायिका के अंगों की तुलना किससे की गई है?

कोमल किसलय के अंचल में नन्ही कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूलि के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली घरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का आँखों में पानी भरे हुए। नीरव निशीथ में लतिका-सी तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाँहे फैलाये-सी आलिंगन का जादू पढ़ती? किन इंद्रजाल के फूलों से लेकर सुहाग-कण-राग-भरे, सिर नीचा कर हो गूंथ माला जिससे मधु धार ढरे? पुलकित कदंब की माला-सी पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फल भरता के डर में। वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बुना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितना सौरभ से सना हुआ। सब अंग मोम से बनते हैं कोमलता में बल खाती हूँ. मैं सिमिट रही-सी अपने में परिहास-गीत सुन पाती हूँ। स्मित बन जाती है तरल हँसी नयनों में भरकर बाँकपना, प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो वह बनता जाता है सपना। किस कारणवश हँसी स्मित में बदल जाती है?

कोमल किसलय के अंचल में नन्ही कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूलि के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली घरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का आँखों में पानी भरे हुए। नीरव निशीथ में लतिका-सी तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाँहे फैलाये-सी आलिंगन का जादू पढ़ती? किन इंद्रजाल के फूलों से लेकर सुहाग-कण-राग-भरे, सिर नीचा कर हो गूंथ माला जिससे मधु धार ढरे? पुलकित कदंब की माला-सी पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फल भरता के डर में। वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बुना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितना सौरभ से सना हुआ। सब अंग मोम से बनते हैं कोमलता में बल खाती हूँ. मैं सिमिट रही-सी अपने में परिहास-गीत सुन पाती हूँ। स्मित बन जाती है तरल हँसी नयनों में भरकर बाँकपना, प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो वह बनता जाता है सपना। पुलकित शब्द में मूल शब्द क्या है?