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एक बार एक बागी गुलाम और एक बादशाह के बीच...

एक बार एक बागी गुलाम और एक बादशाह के बीच बातचीत हुई। यह गुलाम कैदी दिल से आजाद था। बादशाह ने कहा, 'मैं तुमको अभी जान से मार डालूँगा। तुम क्या कर सकते हो? गुलाम बोला हाँ मैं फाँसी पर तो चढ़ जाऊँगा, पर तुम्हारा तिरस्कार तब भी कर सकता हूँ। इस गुलाम ने दुनिया के बादशाहों के बल की हद दिखला दी। बस इतने ही जोर और इतनी ही शेखी पर ये झूठे राजा मारपीट कर कायर लोगों को डराते हैं चूँकि लोग शरीर को अपने जीवन का केन्द्र समझते हैं, इसलिए जहाँ किसी ने इनके शरीर पर जरा जोर से हाथ लगाया वहीं वे मारे डर के अधमरे हो जाते हैं।केवल शरीर-रक्षा के निमित्त ये लोग इन राजाओं की ऊपरी मन से पूजा करते हैं।
सच्चे वीर अपने प्रेम के जोर से लोगों के दिलों को सदा के लिए बाँध देते हैं। फौज, तोप, बन्दूक आदि के बिना ही वे शहंशाह होते हैं। मैसूर ने अपनी मौज में आकर कहा कि मैं खुदा हूँ। दुनियावी बादशाह ने कहा यह काफिर हैं। मगर मैसूर ने अपने कलाम को बन्द न किया। पत्थर मार-मारकर दुनिया ने उसके शरीर की बुरी दशा की, परन्तु उस मर्द के मुँह से हर बार यही शब्द निकला 'अनहलक (अहं ब्रह्मास्मि) मैं ही ब्रह्म हूँ। मैसूर का सूली पर चढ़ना उसके लिए सिर्फ खेल था।
'हाँ, मैं फाँसी पर तो चढ़ जाऊँगा।' यह किसने कहा?

A

बागी गुलाम ने

B

बादशाह ने

C

अलीशेख ने

D

राजा ने

लिखित उत्तर

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The correct Answer is:
A
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