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जीव परमात्मा का ही चेतन अंश है। प्रभु ही...

जीव परमात्मा का ही चेतन अंश है। प्रभु ही जीवन के रूप में शरीर में निवास करते हैं। प्रभुजीव के शरीर का निर्माण कर उसे गतिमान एवं क्रियाशील बनाने हेतु स्वयं उस पारीर में प्राण रूप में विराजमान रहते हैं। यह तथ्य जानते हुए हमें लोक व्यवहार करना चाहिए. इसी में अपना और जगत का कल्याण निहित है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है-ईश्वर अंश जीव अविनाशी। अब प्रश्न उठता है कि जब जीवन परमात्मा का ही अंश है और इतना शक्तिशाली है, तो फिर क्यों गलत कार्य करता है। इसका एक ही उत्तर है कि वह अपने को शरीर मानकर उसी की सुख-सुविधा के लिए संसाधनों के संग्रह हेतु उचित-अनुचित, भलाई-बुराई की अनदेखी करते हुए स्वार्थवश गलत मार्ग पर चल पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप वह कष्ट पाता है और अपमानित होता है। ऐसा आज के आपाधापी के युग में प्रायः देखने को मिल रहा है। निर्मल हृदय में परमात्मा का वास होता हैं जीव के दुःख पाने का एकमात्र कारण है उसकी अज्ञानता। मनुष्य में जब अपने को केवल शरीर मानकर कर्तापन का भाव आ जाता है और वह भौतिकता के वशीभूत होकर उसमें अहंकार का प्रादुर्भाव होने लगता है, तभी वह घोर कष्ट पाता है। मानव चाहे, तो अपने विवेक का इस्तेमाल करके ऐसी स्थितियों से बच सकता है। वह अपने हित-अनहित के विषय में पर्याप्त जानकारी रखने में सर्वदा, समर्थ है यह सामर्थ्य भी परमात्मा की ही दी हुई है, किन्तु वह इसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के बजाय दंभ वंश अपने को ही सर्वशक्तिमान मानने लगता है। जिससे कदम-कदम पर उसे निराशा देखने को मिलती है। मन की प्रवृत्ति चंचल होने के कारण मनुष्य विषयों के प्रति आकर्षित होता रहता है। यह स्थिति व्यक्तित्व में विकार उत्पन्न करती है। मानव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है कि वह परमात्मा का अंश है और वह आत्मा को भूलकर शरीर को ही सब कुछ समझता है। जिस कारण वह घोर कष्ट पाता है और तब वह प्रभु को याद करता है। यदि वह सदैव इस बात का आभास करता रहे कि प्रभु हमारे अन्तःकरण में विराजमान हैं, वह हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहे हैं तो, वह गलत मार्ग पर जाने से बच सकता है।
मनुष्य स्वयं को

A

संवारता है

B

शरीर मानकर उसकी सुख-सुविधा के लिए विवेक का परित्याग कर देता है

C

अपना नियंता समझता है

D

उपरोक्त में से कोई नहीं

लिखित उत्तर

Verified by Experts

The correct Answer is:
B

शरीर मानकर उसकी सुख-सुविधा के लिए विवेक का परित्याग कर देता है
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