Home
Class 14
HINDI
मैं नहीं चाहता चिर सुख चाहता नहीं अविर...

मैं नहीं चाहता चिर सुख
चाहता नहीं अविरल दुख,
सुख-दुख की आँख-मिचौनी
खोले जीवन अपना मुख ।
सुख-दुख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरन,
फिर घन से ओझल हो शशि,
फिर शशि से ओझल हो घन ।
जग पीड़ित है अति दुख से
जग पीड़ित है अति सुख से,
जग पीड़ित है अति दुख से
जग पीड़ित है अति सुख से,
मानव जग में बंट जांवें
दुख-सुख से औ' सुख-दुख से ।
अविरत दुख है उत्पीड़न,
अविरत सुख भी उत्पीड़न
सुख-दुख की निशा-दिवा में
सोता जगता जग-जीवन
इस काव्यांश में प्रमुख भाव है

A

वैराग्य

B

संतुलन

C

शृंगार

D

वीरता

लिखित उत्तर

Verified by Experts

The correct Answer is:
B
Promotional Banner