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BIOLOGY
मनुष्य में वाइरसजनित किन्हीं चार रोगों क...

मनुष्य में वाइरसजनित किन्हीं चार रोगों के नाम लिखिए। इनमें से किसी एक के संक्रमण, विधियों एवं रोकथाम के उपाय लिखिए।

लिखित उत्तर

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ये रोग विषाणुओं के द्वारा फैलते हैं। हपीस, पोलियो, खसरा, रेबीज़, हेपैटाइटिस, एड्स, चेचक, इन्फ्लुएन्जा आदि विषाणुजनित रोग हैं
1.रेबीज (Rabies)—यह विषाणुजनित रोग है। यह प्रकृति में अनेक प्राणियों के काटने से फैलता है, जैसे-कुत्ता, बिल्ली, चूहा, बन्दर, घोड़ा, चमगादड़ आदि। यह रोग मुख्यतः कुत्ते के काटने से फैलता है। संक्रमित जन्तु के काटने से रोग के विषाणु लार के माध्यम से मनुष्य के रुधिर में पहुंच जाते हैं। इस रोग के लक्षण संक्रमण के 6 दिन से 12 महीने पश्चात् दिखाई देते हैं। यह विषाणु पेशियों में गुणन करता है और पेशियों से तन्त्रिका तन्त्र में पहुँच जाता है।
लक्षण (Symptoms)-(क) इसका रोगी पानी से डरने लगता है। इसी कारण इस रोग को हाइड्रोफोबिया (hydrophobia) कहते हैं। (ख) रोगी को तरल भोज्य पदार्थ ग्रहण करने में भी कठिनाई होती है। (ग) इससे सिरदर्द, तीव्र ज्वर, वक्ष व गले की मांसपेशियों में संकुचन से दर्द होता है। (घ) मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु की कोशिकाओं के नष्ट हो जाने से रोगी को पक्षाघात (paralysis) हो जाता है। पक्षाघात के कारण श्वसन अवरुद्ध हो जाने से मृत्यु हो जाती है। बचाव के उपाय (Preventive measures)-कुत्ते की 10 दिन तक निगरानी करनी चाहिए यदि कुत्ते की मृत्यु हो जाती है तो कुत्ता रेबीज विषाणु से संक्रमित माना जाता है। कुत्ते के काटने से बने घाव को एण्टीसेप्टिक (antiseptic) से साफ करके पट्टी करनी चाहिए। एण्टीरेबीज के पाँच टीके संक्रमित कुत्ते के काटने से 0-3-7-14-30 वें दिन लगवाने चाहिए। नवनिर्मित मेरिएक्स मानव कोशिका वैक्सीन के केवल तीन इन्जेक्शन लगाए जाते हैं।
2. एड्स (AIDS_Acquired Immuno Deficiency Syndrome)-यह रोग HIV के कारण होता है। HIV का पूरा नाम मानव प्रतिरक्षा न्यूनता विषाणु (Human Immunodeficiency Virus) है। यह विषाणु मानव शरीर में पहुंचकर प्रतिरक्षा तन्त्र की प्रमुख कोशिकाओं को, जिन्हें लिम्फोसाइट्स `T_4` तथा `T_H` कहते हैं, नष्ट करता है। शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता (immunity) धीरे-धीरे कम होने लगती है, इसके परिणामस्वरूप रोगी संक्रामक रोगों से पीड़ित होकर मर जाता है।
लक्षण (Symptoms)-(क) संक्रमित व्यक्ति में थकावट, ज्वर, सिरदर्द, कमजोरी, खाँसी, अतिसार आदि प्रारम्भिक लक्षण प्रदर्शित होते हैं। (ख) लिम्फ ग्रन्थियों (lymph glands) में सूजन आ जाती है। शरीर का भार कम होने लगता है, त्वचा पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं। (ग) सामान्य उपचार के बाद ठीक भी न होना। बचाव के उपाय (Preventive measures)-एड्स के बचाव के लिए अभी तक कोई प्रभावी उपचार या टीका विकसित नहीं हो पाया है। एड्स की जानकारी ही एड्स से बचाव है। फिर भी निम्नलिखित विधियों द्वारा इसके प्रसार को रोका जां सकता है -
(क) रुधिर आधान के समय यह जाँच कर लेनी चाहिए कि रुधिर HIV-मुक्त हो। (ख) लैंगिक सम्बन्ध स्थापित करने में सावधानी रखनी चाहिए, कण्डोम का उपयोग करना चाहिए। अनेक व्यक्तियों से लैंगिक सम्पर्क (multiple sex) से बचना चाहिए। (ग) दाढ़ी बनाने के लिए सदैव अपना ही ब्लेड प्रयुक्त करना चाहिए। (घ) इन्जेक्शन की सुई का प्रयोग एक बार ही करना चाहिए। एड्स परीक्षण एलीसा टेस्ट (Elisa test), HIV-I तथा HIV-II Blot किट द्वारा किया जाता है। जाइडोवुडाइन । (Zydovudine-AZT) रोग की प्रगति दर को कम कर देता है। 3.हेपैटाइटिस (Hepatitis)—यह विषाणुजनित यकृत रोग है। इसे सामान्य भाषा में पीलिया (jaundice) कहते हैं। इस रोग में यकृत में सूजन आ जाती है। इसमें रोगी की पाचन क्रिया प्रभावित होती है। सर्वाधिक घातक हेपैटाइटिस A तथा B हैं।
रोग के लक्षण (Symptoms)-(क) प्रारम्भ में रोगी को भूख नहीं लगती, जी मिचलाने लगता है तथा तीव्र ज्वर, सिरदर्द, जोड़ों में दर्द एवं थकान हो जाती है। (ख) पित्तवर्णक के शरीर में एकत्र होने से त्वचा का रंग पीला-सा हो जाता है और गहरे पीले रंग का मूत्र आने लगता है। बचाव के उपाय (Preventive measures)-(क) उबले हुए क्लोरीनीकृत या ओजोन उपचारित जल का प्रयोग करना चाहिए। (ख) रोगी के वस्त्र, बर्तन, बिस्तर आदि को समय-समय पर नि:संक्रमित करते रहना चाहिए। (ग) रोगी को स्वच्छ वातावरण में रखना चाहिए। (घ) हेपैटाइटिस B का टीका लगवाना चाहिए। उपचार (Treatment)-(क) इण्टरफेरॉन (interferon) इन्जेक्शन से रोग को नियन्त्रित किया जा सकता है। (ख) रोगी को गन्ने का रस तथा ग्लूकोस अधिक मात्रा में पीना चाहिए। (ग) रोगी को अधिकाधिक विश्राम करना चाहिए।
4. पोलियो (Polio) यह रोग पोलियोमाइलिटिस (Poliomyelitis) नामक विषाणु के कारण होता है। यह सबसे छोटा विषाणु है। इसमें कुण्डलित R.N.A. अणु होता है। यह विषाणु संक्रमित जल तथा भोजन द्वारा स्वस्थ मनुष्य में पहुँचता है। विषाणु आहार नाल की कोशिकाओं में प्रवेश कर जाते हैं और वृद्धि करते हैं। यहाँ से लसीका तन्त्र एवं रुधिर परिसंचरण द्वारा केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र में पहुँच जाते हैं।
लक्षण (Symptoms)-विषाणु मेरुरज्जु के पृष्ठ शृंगों (dorsal horns) को नष्ट कर देता है। पृष्ठ श्रृंग के नष्ट होने के कारण पेशियों को प्रेरणा नहीं पहुँच पाती और धीरे-धीरे पेशियों का ह्रास होने लगता है। इससे मेरुरज्जु द्वारा नियन्त्रित अंगों में पक्षाघात (paralysis). हो जाता है। विषाणु द्वारा मस्तिष्क मैडुला को संक्रमित करने के पश्चात् जिह्वा, चेहरे और गर्दन की पेशियों का पक्षाघात हो जाता है। भोजन निगलने में कठिनाई होती है। बचाव के उपाय (Preventive measures)-रोकथाम हेतु बच्चों को पोलियो वैक्सीन दी जानी चाहिए। पोलियो वैक्सीन एल्बर्ट साबिन (Albert Sabin) ने विकसित की थी।
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