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BIOLOGY
मनुष्य के शरीर में संक्रमण से बचने के लि...

मनुष्य के शरीर में संक्रमण से बचने के लिए कौन-सी तीन सुरक्षा प्रणालियाँ पायी जाती हैं? प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया की प्रमुख विशेषता का वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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हानिकारक प्रोटीनयुक्त बाह्य पदार्थ (प्रतिजन : antigen) शरीर के लिए हानिकारक होता है। शरीर में इस बाह्य आक्रमण से बचाव के लिए अनेक प्रकार की रक्षा प्रणालियाँ होती हैं। इन्हें प्रतिरक्षी तन्त्र या प्रतिक्रिया (immune system or reaction) कहते हैं।
किसी बाह्य संक्रमण या आक्रमण से बचाव के लिए हमारे शरीर में तीन प्रकार की रक्षा प्रणालियाँ होती हैं -
I. प्रथम रक्षात्मक स्तर (first line of defence) II. द्वितीय रक्षात्मक स्तर (second line of defence) या अविशिष्ट सुरक्षा प्रणाली (non-specific immunity), III. विशिष्ट सुरक्षा प्रणाली या अनुकूली प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया (specific immunity or immune response or acquired immunity)
I. प्रथम रक्षात्मक स्तर
शारीरीय .अवरोधक (Anatomic or physical barriers)-हमारे शरीर की त्वचा तथा अंगों की श्लेष्म कला रोगाणुओं के प्रवेश के लिए एक अवरोधक (barrier) की भाँति कार्य करती है। यह किसी भी बाह्य पदार्थ या रोगाणु को शरीर के भीतर प्रवेश नहीं करने देती है। स्वेद ग्रन्थि से स्त्रावित तरल में लाइसोजाइम (lysozyme) पाया जाता है। यह अनेक जीवाणुओं की कोशिकाभित्ति को नष्ट कर देता है। त्वचा की किरेटिनयुक्त मृत कोशिकाएँ शरीर से पृथक होती रहती हैं जिसके कारण जीवाणु, विषाणु आदि त्वचा से पृथक् होते रहते हैं। आँसू में लाइसोजाइम पाया जाता है। लार में उपस्थित लाइसोजाइम भोजन में उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट करता है। श्वसन तन्त्र की श्लेष्मा पर श्लेष्म (mucous) की एक पर्त तथा पक्ष्माभ (cilia) होते हैं। ये सब वायु में उपस्थित धूल . कणों तथा रोगाणुओं को फेफड़ों के भीतर प्रवेश करने से रोकते हैं।
II. द्वितीय रक्षात्मक स्तर या अविशिष्ट प्रतिरक्षा तन्त्र
कुछ रोगाणु शरीर के प्रथम रक्षात्मक स्तर को पार करके शरीर में पहुँच जाते हैं। इनको नष्ट करने का कार्य अविशिष्ट प्रतिरक्षा तन्त्र करता है। इसमें कुछ विशिष्ट रसायन तथा श्वेतं रुधिराणु भाग लेते हैं।
(क) भक्षण सुरक्षा तन्त्र (Phagocytic defence system)-श्वेत रुधिराणुओं के न्यूट्रोफिल्स (neutrophils) तथा मोनोसाइट्स (monocytes) रोगाणुओं, मृत कोशिकाओं तथा निरर्थक पदार्थों का भक्षण (phagocytosis) करके उन्हें नष्ट कर देते हैं। ये शरीर की सफाई तथा सुरक्षा करते हैं। (ख) शोथ प्रतिक्रिया (Inflammatory response)-चोट लगने, कटने या जलने के कारण क्षतिग्रस्त कोशिकाएँ (injured cells), हिस्टैमीन (histamine) मुक्त करती हैं। इसके प्रभाव से रुधिर केशिकाओं में प्रसारण (dilation) हो जाता है | श्वेत रूधिर कणिकाएँ (WBCs) रक्त केशिकाओं से निकलकर क्षतिग्रस्त स्थान पर एकत्र हो जाती हैं। इससे वह. स्थान लाल व गर्म हो जाता है। श्वेत रुधिराणुओं की न्यूट्रोफिल तथा मोनोसाइट कोशिकाएँ भक्षकाणु क्रियाः (phagocytosis) करने लगती हैं। यह स्थानीय शोथ प्रतिक्रिया (local inflammatory response) कहलाती है। रोगाणुओं द्वारा उत्पन्न विषाक्त टॉक्सिन के कारण श्वेत रुधिराणु सक्रिय होकर पाइरोजन्स (pyrogens) का स्रावण करते हैं। पाइरोजन्स के कारण शरीर का ताप बढ़ जाता है, ये श्वेत रुधिराणुओं की सक्रियता को बढ़ाते हैं। ये रोगाणुओं को नष्ट करते हैं। यह दैहिक शोथ प्रतिक्रिया (systemic inflammatory response) कहलाता है।

(ग)इण्टरफेरॉन (Interferon)-इनकी खोज इसाक्स (Isaacs, 1957) ने की थी। यह अतिविशिष्ट सुरक्षा प्रणाली है। इण्टरफेरॉन बहुत छोटे एण्टीवाइरल प्रोटीन अणु (antiviral protein molecules) होते हैं, जिनका संश्लेषण शरीर कोशिकाओं द्वारा विषाणु संक्रमण के पश्चात् होता है। इण्टरफेरॉन असंक्रमित शरीर की कोशिकाओं की सतह पर चिपककर विशेष प्रकार के एन्जाइम के संश्लेषण को प्रोत्साहित करते हैं। ये विशिष्ट एन्जाइम विषाणु mRNA को नष्ट करकें वाइरल प्रोटीन संश्लेषण को रोकते हैं। अतः इण्टरफेरॉन (interferons) स्वस्थ कोशिकाओं को वाइरस संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करते हैं। सभी विषाणुओं
के लिए एक ही प्रकार के इण्टरफेरॉन उत्पन्न होते हैं। इण्टरफेरॉन प्रतिरक्षी उत्पादन (antibodies production) तथा T-लिम्फोसाइट्स को प्रोत्साहित करते हैं। ये मैक्रोफेज कोशिकाओं की भक्षण (phagocytic) क्रिया को बढ़ाते हैं। III. विशिष्ट सुरक्षा प्रणाली या प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया (Specific Immunity or Immune Response) कभी-कभी रोगाणु प्रथम तथा द्वितीय रक्षात्मक स्तर को पार करके संक्रमण (infection) स्थापित करने में सफल हो जाते हैं। उस स्थिति में विशिष्ट सुरक्षा प्रणाली कार्य करती है। विशिष्ट सुरक्षा प्रणाली या प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया में प्रत्येक प्रकार के रोगाणु के लिए शरीर के प्रतिरक्षा तन्त्र द्वारा एक विशिष्ट प्रतिक्रिया होती है। शरीर के सभी लसीका अंगों (lymphoid organs) के लिम्फोसाइट्स तथा संयोजी ऊतक की प्लाज्मा कोशिकाएँ मिलकर शरीर की विशिष्ट सुरक्षा प्रणाली या शरीर का प्रतिरक्षा तन्त्र (immune system) बनाती हैं। इस तन्त्र की मुख्य कोशिकाएँ लिम्फोसाइट्स हैं। लिम्फोसाइट्स (lymphocytes) दो प्रकार की होती हैं: टी-लिम्फोसाइट्स या टी-कोशिकाएँ (T-lymphocytes or T-cells) और बी-लिम्फोसाइट्स या बी-कोशिकाएँ (B-lymphocytes or B-cells)| सभी लिम्फोसाइट्स का उत्पादन अस्थिमज्जा में ही होता है, जो लिम्फोसाइट्स थाइमसंग्रन्थि (thymus gland) में जाकर परिपक्व होती हैं, वे टी-लिम्फोसाइट्स में विभेदित हो जाती हैं और जो लिम्फोसाइट्स लसीका ऊतक (lymphoid tissue) में परिपक्व होती हैं, वे बी-लिम्फोसाइट्स में विभेदित होती हैं। टी-लिम्फोसाइट्स कोशिका मध्यस्थ प्रतिरक्षा के लिए उत्तरदायी हैं तथा बी-लिम्फोसाइट्स प्रतिरक्षी मध्यस्थ प्रतिरक्षा के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रतिरक्षा तन्त्र (immune system) दो प्रकार का होता है- (अ) कोशिका मध्यस्थ प्रतिरक्षा (cell mediated immunity), (ब) प्रतिरक्षी मध्यस्थ प्रतिरक्षा (antibody mediated immunity)।
(अ) कोशिका मध्यस्थं प्रतिरक्षा
रोगाणुओं द्वारा उत्पन्न प्रतिजनों (antigens) के सम्पर्क में आने पर टी-लिम्फोसाइट्स सक्रिय हो जाती हैं। सक्रिय होने के पश्चात् लिम्फोसाइट्स की संख्या में वृद्धि समसूत्री विभाजन द्वारा होती है। विभाजन के पश्चात् अनेक प्रकार की टी-लिम्फोसाइट्स का निर्माण होता है। ये लिम्फोसाइट्स निम्नलिखित होती हैं -
(i) किलर टी-लिम्फोसाइट्स, (ii) सहायक या हैल्पर टी-लिम्फोसाइट्स, । (iii) दमनकारी या सप्रेसर टी-लिम्फोसाइट्स, (iv) स्मरण कोशिकाएँ या मैमोरी कोशिकाएँ।
(i) किलर टी-लिम्फोसाइट्स (Killer T-lymphocytes)-ये कोशिकाएँ रोगाणु कोशिका (pathogen cells) पर सीधे आक्रमण करके उसे नष्ट कर देती हैं। | (ii) सहायक या हैल्पर टी-लिम्फोसाइट्स (Helper T-lymphocytes)-ये कोशिकाएँ ऐसे पदार्थ स्रावित करती हैं, जो किलर टी-लिम्फोसाइट्स तथा बी-लिम्फोसाइट्स की सक्रियता को बढ़ाते हैं।

(iii) दमनकारी या संप्रेसर टी-लिम्फोसाइट्स (Suppressor T-lymphocytes)-ये कोशिकाएँ संक्रमण समाप्त होने के पश्चात् शरीर के प्रतिरक्षा तन्त्र की सक्रियता को रोकती हैं। इसके साथ ही ये प्रतिरक्षा तन्त्र को स्वयं की कोशिकाओं तथा बाहरी आक्रमणकारी पदार्थ (प्रतिजन) के बीच भेद करना सिखाती हैं। (iv) स्मरण कोशिकाएँ या मैमोरी कोशिकाएँ (Memory cells)-रोगाणु के सम्पर्क में आयी कुछ टी-लिम्फोसाइट्स संवेदनशील होने के पश्चात् लसीका ऊतक में स्मरण कोशिकाओं (memory cells) के रूप में संगृहीत हो जाती हैं। दोबारा वही संक्रमण होने पर ये कोशिकाएँ तुरन्त सक्रिय हो जाती हैं और उस रोगाणु विशेष के प्रति प्रतिरक्षियों (antibodies) का निर्माण प्रारम्भ कर देती हैं।
(ब) प्रतिरक्षी मध्यस्थ प्रतिरक्षा बी-लिम्फोसाइट्स प्रतिरक्षियों (antibodies) का उत्पादन करती हैं। बी-लिम्फोसाइट्स दो प्रकार से प्रतिरक्षियों का उत्पादन करती हैं। कुछ बी-लिम्फोसाइट्स सक्रिय होकर प्लाज्मा कोशिकाओं (plasma cells) में विभेदित हो जाती हैं। प्लाज्मा कोशिकाएँ लसीका ऊतक में रहकर प्रतिरक्षी का उत्पादन करती हैं। ये प्रतिरक्षी लसीका व रुधिर में पहुँचकर विशिष्ट रोगाणु या .. उनके विषैले पदार्थ (toxin) को नष्ट करती हैं। कुछ सक्रिय बी-लिम्फोसाइट्स स्मरण कोशिकाओं के रूप में लसीका ऊतक में संगृहीत हो जाती हैं। शरीर में जब दोबारा . वही संक्रमण होता है, तब ये स्मरण कोशिकाएँ अपने जैसी लाखों कोशिकाएँ बनाकर. तेजी से प्रतिरक्षियों (antibodies) का उत्पादन प्रारम्भ कर देती हैं।
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