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BIOLOGY
मदिरा सेवन से होने वाले दुष्प्रभावों का ...

मदिरा सेवन से होने वाले दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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प्रतिरक्षा तन्त्र में दो प्रकार की गड़बड़ियाँ हो सकती हैं -
1. प्रतिरक्षा तन्त्र अत्यधिक सक्रिय हो जाए, 2. प्रतिरक्षा तन्त्र कार्य न कर पाए।
इसमें प्रतिरक्षा तन्त्र अधिक सक्रिय हो जाता है। प्रतिरक्षा तन्त्र के अधिक सक्रिय होने से होने वाली जटिलताएँ निम्नलिखित हैं -
1. एलर्जी (Allergy)-एलर्जी में अहानिकर तथा मन्द प्रतिजनों (mild antigens) के विरुद्ध भी प्रतिरक्षी का निर्माण होने लगता है। ऐसे मन्द प्रतिजनों को एलर्जन (allergen) कहते हैं। जैसे परागकण, धूल की चिचड़ी (mites), प्राणी लघु शल्क (animal dander) आदि एलर्जन के सामान्य उदाहरण हैं। सामान्य व्यक्तियों में एलर्जन के विरुद्ध प्रतिरक्षी नहीं बनते हैं, किन्तु जिन व्यक्तियों का प्रतिरक्षा तन्त्र अधिक सक्रिय हो जाता है, उनमें सामान्य एलर्जनों के विरुद्ध भी प्रतिरक्षी निर्माण होने लगता है। हे-ज्वर (hay fever), अस्थमा (asthma) आदि ऐसे ही एलर्जी से होने वाले रोग हैं। जब एलर्जन शरीर में प्रवेश करता है, तब विशेष प्रतिरक्षी, जिन्हें रिएजिन (reagin) कहते हैं, मुक्त हो जाते हैं। रिएजिन मास्ट कोशिका के प्राप्ति स्थल (receptor site) से जुड़ जाते हैं। इस जटिल (complex) से एलर्जन भी जुड़ जाता है। अब मास्ट कोशिकाएँ हिस्टैमीन (histamine) के स्राव को प्रेरित करती हैं।हिस्टैमीन एक शोथ (inflammating) पदार्थ है। हिस्टैमीन रुधिर केशिकाओं का विस्तारण या डायलेशन (dilation) कर देती है जिससे उनकी पारगम्यता बढ़ जाती है। इसके फलस्वरूप वह स्थान लाल हो जाता है तथा सूज जाता है।
दैहिक एनाफाइलेक्सिस या एनाफाइलेक्टिक आघात - एक घातक एलर्जिक क्रिया (dangerous allergic reaction) है। कभी-कभी किसी सामान्य औषधि जैसे पेनिसिलीन या मधुमक्खी के काटने आदि से यह क्रिया हो जाती है। पूरे परिसंचरण तन्त्र में हिस्टैमीन मुक्त हो जाती है जिससे सभी रुधिर वाहिनियों में विस्तारण (dilation) हो जाता है और बहुत सारा प्लाज्मा रुधिर कोशिकाओं से बाहर निकल जाता है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति की कुछ ही मिनटों के भीतर मृत्यु भी हो सकती है। 2. स्वयं प्रतिरक्षा रोग या आत्म आक्रामक रोग (Autoimmune disease)-इस रोग में शरीर की स्वयं की कोशिकाओं के प्रति ही प्रतिरक्षी बनने लगते हैं तथा सम्बन्धित कोशिकाएँ अपने ही प्रतिरक्षा तन्त्र के द्वारा नष्ट होने लगती हैं जैसे-रखूमैटॉएंड आर्थाइटिस (rheumatoid arthritis) में साइनोवियल कला (synovial membrane) के प्रति प्रतिरक्षी बनने लगते हैं, मायस्थेनिया ग्रेविस (mysthenia gravis) में अपनी ही पेशियों के प्रति प्रतिरक्षी बनने लगते हैं। मल्टीपल स्क्लेरोसिस (multiple sclerosis) में तन्त्रिका कोशिकाओं के प्रति प्रतिरक्षी निर्माण होने लगता है। दीर्घकाली अरक्तता (chronic anaemia) में RBCs के प्रति प्रतिरक्षी बनने लगते हैं। हाशीमोटो रोग (Hashimotto disease) में थायरॉइड कोशिकाओं के प्रति प्रतिरक्षी बनने लगते हैं। 3. एरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटेलिस (Erythroblastosis foetalis)---यह रोग नवजात शिशुओं में Rh कारक (Rh factor) के प्रति प्रतिरक्षी उत्पादन के कारण होता है। रुधिर में Rh कारक उपस्थित व्यक्तियों को Rh धनात्मक (`Rh^+`) तथा Rh कारक अनुपस्थित व्यक्तियों को Rh ऋणात्मक (`Rh^-` ) कहा जाता है।


यदि एक `Rh^+` पुरुष का विवाह Rh- महिला से होता है, तब उनके बच्चे `Rh^-` होते हैं। Rh- महिला का प्रथम शिशु ` Rh^+ ` होता है तो माता के रुधिर में Rh कारक के प्रति प्रतिरक्षी का निर्माण होने लगता है लेकिन प्रतिरक्षी से प्रथम शिशु अप्रभावित रहता है। दूसरा शिशु भी `Rh^+` होता है, माता के रुधिर में उपस्थित प्रतिरक्षी शिशु के लाल रुधिराणुओं को नष्ट करने लगते हैं। इससे गर्भस्थ शिशु में हीमोलिटिक रक्ताल्पता (haemolytic anaemia) हो जाता है। अधिक घातक अवस्था होने पर शिशु की गर्भावस्था में ही मृत्यु हो जाती है। यदि प्रतिरक्षा तन्त्र भली-भाँति कार्य न करे या बिलकुल ही कार्य न करे, तब भी अनेक घातक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। प्रतिरक्षा न्यूनता रोगया इम्यूनोड़ेफिसिएन्सी (Immunodeficiency)-कभी-कभी कुछ शिशु बिना टी-लिम्फोसाइट्स या बी-लिम्फोसाइट्स के पैदा होते हैं। इन लक्षणों को क्रमशः डि जॉर्ज सिन्ड्रोम (Di George.s Syndrome) तथा अगामाग्लोबुलिनेमिया (Agammaglobulinemia) कहते हैं। ऐसे शिशु किसी भी रोग के रोगाणुओं से आसानी से संक्रमित हो जाते हैं। अधिक घातक अवस्था में सभी प्रकार की लिम्फोसाइट्स पूर्णतया अनुपस्थित होती हैं। इस अवस्था को .उग्र संयुक्त प्रतिरक्षा न्यूनता. (severe combined immunodeficiency : SCID) कहते हैं। ऐसे शिशुओं की मृत्यु बाल्यावस्था में ही हो जाती है। उपार्जित प्रतिरक्षा न्यूनता सिण्ड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome : AIDS)-एड्स विषाणु संक्रमण GLYCOPROTEINSA के कारण प्रतिरक्षा तन्त्र पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है। . एड्स रोग ह्यूमैन इम्यूनोडेफिसिएन्सी विषाणु (human Immunodeficiency Virus : HIV) के संक्रमण के कारण होता है। इस रोग में टी-लिम्फोसाइट्स पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती हैं।
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