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BIOLOGY
पी० सी० आर० का उपयोग करते हुए लाभकारी जी...

पी० सी० आर० का उपयोग करते हुए लाभकारी जीन का प्रवर्धन समझाइए।

लिखित उत्तर

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इस अभिक्रिया को सर्वप्रथम कैरी मुलिस (Kary Mullis, 1985) ने खोजा था, इसके लिए 1993 में उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस विधि में द्विरज्जुकी D.N.A. अणु को उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है जिससे. D.N.A. के दोनों एज्जुक एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। यह प्रक्रिया D.N.A. प्रतिकृतियन (replication) की भाँति होती है, इसे प्रयोगशाला में एपेनडार्फ नलियों (Eppendorf tubes) में सम्पन्न कराया जाता है। इन नलियों में वांछनीय डी० एन० ए०, जिसकी प्रतिकृतियाँ प्राप्त करनी होती हैं, के साथ-साथ ओलीगोन्यूक्लियोटाइड प्रारम्भकों (primers) की आवश्यकता होती है। ताप स्थायी एन्जाइम D.N.A. पॉलिमरेज (D.N.A. polymerase) जिसे टैक पॉलिमरेज (Taq polymerase) भी कहते हैं, नए D.N.A. निर्माण के लिए आवश्यक होता है। इस एन्जाइम को थर्मस एक्वेटिकस (Thermus aquaticus) नामक जीवाणु से प्राप्त किया जाता है। यह एन्जाइम `90^@C` ताप पर भी सक्रिय रहता है। इस अभिक्रिया में उपक्रमकों (प्रारम्भकों या प्राइमर्स छोटे रासायनिक संश्लेषित अल्प न्यूक्लियोटाइड जो डी० एन०ए० क्षेत्र के पूरक होते हैं) के दो समुच्चयों (sets) व डी०एन० ए० पॉलिमरेज एन्जाइम का उपयोग करते हुएं पात्रे (इनविट्रो) विधि द्वारा उपयोगी जीन की अनेक प्रतिकृतियों का संश्लेषण होता है। यह एन्जाइम जीनोमिक डी० एन० ए० को. टेम्पलेट के रूप में प्रयोग करके, अभिक्रिया से मिलने वाले न्यूक्लियोटाइड्स का उपयोग करते हुए उपक्रमकों को विस्तृत कर देता है। यदि डी० एन० ए० प्रतिकृतीयन प्रक्रम कई बार दोहराया जाता है, तब डी० एन० ए० खण्ड को लगभग एक अरब गुना प्रवर्धित किया जा सकता है अर्थात् एक अरब प्रतिरूपों का निर्माण होता है। यह सतत प्रवर्धन ताप स्थापी डी० एन० ए० पॉलिमरेज एन्जाइम द्वारा किया जाता है। उच्च तापमान द्वारा प्रेरित डी० एन० ए० के विकृतीकरण के समय भी यह हमेशा सक्रिय बना रहता है। यदि आवश्यकता पड़े तो प्रवर्धित खण्ड को संवाहक (vector) के साथ बाँधकर क्लोनिंग (cloning) में प्रयोग कर सकते हैं।

पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया में तीन प्रमुख चरण होते हैं-(A) विकृतिकरण (denaturation), (B) उपक्रमक तापानुशीतन (annealing) तथा (C) विस्तारण या प्रसार (extension)| इस प्रक्रिया के अन्त में 2n अणु प्राप्त होते हैं जहाँ n इस चक्रीय प्रक्रमों की संख्या है।
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