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समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तिया...

समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमें लोक-संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होते। दूसरे, भले ही आप अपने सामने एक ऊँचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं, तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसन्द-नापसन्द से किए जाते कार्य वासनाओं को बदाए बिना नहीं रहते। कोई कार्य आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसन्द है! उसी तरह कोई कार्य करने से आपको महज इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह कार्य आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसन्द और नापसन्द आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। आप इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें।
इस गद्यांश में किस प्रकार के कार्यों का समर्थन किया गया है?

A

जो बुद्धि और विवेक-शक्ति के आधार पर किए जाते हैं

B

जो मनचली भावनाओं और बुद्धि से दूर होते हैं

C

जो मनचाहे होते हैं

D

जो मनचाहे नहीं होते हैं

लिखित उत्तर

Verified by Experts

The correct Answer is:
A
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