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लोकगीत अपनी लोच, ताजगी और लोकप्रियता में...

लोकगीत अपनी लोच, ताजगी और लोकप्रियता में शास्त्रीय संगीत से भिन्न हैं। लोकगीत सीधे जनता के संगीत हैं। घर, गाँव और नगर की जनता के गीत हैं थे। इनके लिए साधना की जरूरत नहीं होती। त्योहारों और विशेष अवसरों पर ये गाए जाते हैं।
एक समय था जब शास्त्रीय संगीत के सामने इनको हेय समझा जाता था। अभी हाल तक इनकी बड़ी उपेक्षा की जाती थी पर इधर साधारण जनता की ओर जो लोगों की नजर फिरी है तो साहित्य और कला के क्षेत्र में भी परिवर्तन हुआ है। अनेक लोगों ने विविध बोलियों के लोक-साहित्य और लोकगीतों के संग्रह पर कमर बंधी है और इस प्रकार के अनेक संग्रह अब तक प्रकाशित भी हो गए हैं।
वास्तविक लोकगीत देश के गाँवों और देहातों में हैं। इनका सम्बन्ध देहात की जनता से है। चैता, कजरी, बारहमासा, सावन आदि मिर्जापुर, बनारस और उत्तर प्रदेश के पूर्वी और बिहार के पश्चिमी जिलों में गाए जाते हैं। बाउल और भतियाली बंगाल के लोकगीत हैं। हीर-रांझा, सोहनी-महीवाल सम्बन्धी गीत पंजाबी में और कोला-मारू आदि के गीत राजस्थानी में बड़े चाव से गाए जाते हैं।
देहात की जनता का तात्पर्य है

A

कस्बे का जनसमुदाय

B

ग्रामीण जनसमुदाय

C

शहरी जनसमुदाय

D

आदिवासी जनसमुदाय

लिखित उत्तर

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The correct Answer is:
B
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