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BIOLOGY
जैव तकनीकी के उत्पाद हैं...

जैव तकनीकी के उत्पाद हैं

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जैव प्रौद्योगिकी, (Biotechnology)-नये उत्पादों एवं सेवाओं हेतु प्राकृतिक विज्ञान, जीवों, उनकी कोशिकाओं/ऊत्तकों तथा उनके अंगों व आण्विक अनुरूपों का समायोजन जैव प्रौद्योगिकी कहलाता है।
जीनी इंजीनियरी या जैव प्रौद्योगिकी का प्रयोग व्यावसायिक उत्पादनों, मानव जीन्स की खोज, रोगों के कारण व उनके इलाज में किया जा रहा है। इस प्रौद्योगिकी के महत्त्वपूर्ण उपयोग निम्नलिखित है
इस तकनीक के द्वारा मानव इन्सुलिन (human insulin), मानव वृद्धि हॉर्मोन (growth hormones) तथा मानव इन्टरफेरॉन (interferons), सोमेटोस्टेटिन (somatosiatin), थाइमोसिन (thymocin) आदि हॉर्मोन का औद्योगिक स्तर पर उत्पादन किया जा रहा है।
(2) इस तकनीक का उपयोग अनेक संगीन व जटिल अपराधों को सुलझाने में किया जाता है। इस विधि की सहायता से रुधिर, वीर्य, बाल, त्वचा आदि के डी० एन० ए० का अध्ययन सरलता से किया जा सकता है। इसके परिणामों से माता-पिता, अपराधियों, क्षत-विक्षत शवों को सही पहचान की जा सकती है।
(3) जीन इंजीनियरी तकनीक द्वारा आर्थिक महत्त्व के शाकनाशी सहनशील प्रतिरोधी (herbicide tolerant plants) पौधे बनाए जा रहे हैं। इसमें शाकनाशी प्रतिरोधी जीन दूसरे पौधों से स्थानान्तरित किए जाते हैं। (4) जीन इंजीनियरी द्वारा कीट सहनशील पादप (insect tolerant plants) विकसित किए जाते हैं जैसे बैसीलस थ्यूरिनजिएन्सिस नामक बैक्टीरिया में पायी जाने वाली कीट प्रतिरोधी जीन अनेक पौधों में प्रत्यारोपित करके कीट प्रतिरोधी पौधे विकसित किए गए हैं। (5) जीन पुनर्सयोजन तकनीक द्वारा जनन कोशिकाओं का रूपान्तरण ट्रांसजेनेसिस कहलाता है और इस प्रकार से प्राप्त पौधों व .जन्तुओं को क्रमश: ट्रांसजेनिक पौधे (transgenic plants) व ट्रांसजेनिक जन्तु (transgenic animals) कहते हैं। फसली पादपों में वैज्ञानिकों ने मक्का,आलू व कपास आदि में इस तकनीक द्वारा अत्यधिक उत्पादन व कीटों के प्रति सहनशील प्रजातियाँ विकसित कर ली है। जन्तुओं में माइक्रोइंजेक्शन (microinjection) तकनीक द्वारा भेड़, बकरी, सुअर, खरगोश आदि ट्रांसजेनिक जन्तु उत्पन्न किए गए हैं।
(6) जीन उपचार तकनीक द्वारा जटिल व घातक रोगों का उपचार सम्भव है। इसके द्वारा रोगात्मक जीन को पृथक करना अथवा उसमें परिवर्तन करना सम्भव है। जीन उपचार की यह शाखा अभी अपने विकास की प्रारम्भिक अवस्था में है। जीन इंजीनियरी द्वारा हीमोफीलिया, फिनाइलकीटोन्यूरिया जैसे वंशागत रोगों का उपचार सम्भव हुआ है। D.N.A. पुनसंयोजन तकनीक का उपयोग गर्भस्थ शिशु में थैलेसीमिया जैसे अनेक रोगों का पता लगाने के लिए किया जा रहा है।
अनेक पौधे और जन्तु गोलकृमियों (nematods) द्वारा संक्रमित होते हैं। इससे इनकी उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। एग्रोबैक्टीरियम (Agrobacterium) गोलकृमियों के संक्रमण को रोकता है। पादपों की जंगली प्रजातियों से रोधी जीन को पृथक करके एग्रोबैक्टीरियम का वाहक के रूप में उपयोग किया जाता है। टमाटर, गेहूँ, कपास, तम्बाकू आदि में यह प्रक्रिया उपयोगी सिद्ध हुई है।
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