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BIOLOGY
ऐम्नियोसेन्टेसिस पर टिप्पणी कीजिए।...

ऐम्नियोसेन्टेसिस पर टिप्पणी कीजिए।

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जन्मपूर्व निदान तकनीक (Antenatal diagnosis technique), या ऐम्नियोसेन्टेसिस (Amniocentesis)मनुष्यों में अनेक आनुवंशिक रोग पाए जाते हैं जो जीन उत्परिवर्तन के कारण उत्पन्न होते है। ऐसे रोगों से प्रभावित माता-पिता के डी० एन० ए० परीक्षण के द्वारा उनका जीनरूप (genotype) ज्ञात करके सन्तानों में इन रोगों की सम्भावना का पता लगाया जा सकता है। यदि एक .भ्रूण में इन रोगों को ले जाने वाले जीन उपस्थित है तब इन जीनों को स्वस्थ जीनों द्वारा बदल दिया जाता है, इस. प्रकार इन रोगों का उपचार किया जाता है। पश्चयुग्मज अवस्था में भ्रूण के खराब जीन को स्वस्थ जीन के द्वारा बदलकर रोग को समाप्त किया जा सकता है। भ्रूणीय अवस्था में जन्मपूर्व निदान (anternatal diagnosis) की यह तकनीक ऐम्नियोसेन्टेसिस (amniocentesis) कहलाती है। इस विधि में भ्रूण के चारों ओर उपस्थित ऐम्नियोटिक गुहा में उपस्थित द्रव ऐम्नियोटिक द्रव (amniotic fluid) की कुछ मात्रा को इन्जेक्शन सुई की सहायता से बाहर निकाल लिया जाता है। इस द्रव में भ्रूणं से विकसित कुछ कोशिकाएँ स्वतन्त्र रूप में विद्यमान होती हैं। इन कोशिकाओं को वर्धित करके विभिन्न तकनीकों के द्वारा इनका परीक्षण करके, विभिन्न वंशानुगत रोगों का पता लगाया जा सकता है जिससे उनका निदान किया जा सके।
मनुष्यों में लगभग 3500 विभिन्न आनुवंशिक रोग त्रुटिपूर्ण जीनों के कारण होते हैं जैसे हीमोफीलिया (haemophilia), दात्र कोशिका एनीमिया (sickle celled anaemia), फिनाइलकीटोन्यूरिया (phenylketonurin : PKU) आदि रोगों का जीनी उपचार किया जा सकता है। इनके उपचार के लिए त्रुटिपूर्ण जीन के स्थान पर स्वस्थ जीन प्रत्यारोपित किया जाता है। यह विधि जीनी सर्जरी अथवा जीन प्रतिस्थापन (gene surgery or gene replacement) कहलाती है। जोनी निदान में उपयोगी कुछ प्रमुख विषाणु निम्नलिखित हैं
(i) रेट्रोवाइरस (Retrovirus)-विषाणुओं का ऐसा वर्ग जो अपने आर० एन०ए० जीनोम से द्विकुण्डलीय डी० एन० ए० प्रतियों का निर्माण करने में सक्षम होता है रेट्रोवाइरस कहलाता है। इस वर्ग के विषाणुओं का उपयोग जीनी निदान में किया जाता है।
(ii) एडीनोवाइरस (Adenovirus)-विषाणुओं का ऐसा वर्ग जो मनुष्यों में श्वसन, पाचन तथा नेत्र सम्बन्धित रोगों के लिए उत्तरदायी होता है एडीनोवाइरस कहलाता है। ये विषाणु द्विकुण्डलीय डी० एन० ए० युक्त होते हैं तथा इनका उपयोग भी जीनी निदान में किया जाता है। (iii) एडीनो-सम्बन्धित विषाणु (Adeno-related virus)-छोटी एकल डी० एन० ए० शृंखलायुक्त विषाणुओं का समूह, जो मानव के क्रोमोसोम-19 में विशिष्ट स्थान पर अपना गुणसूत्र जोड़ने की क्षमता रखता है, का उपयोग भी हम जीनी निदान में कर सकते हैं।
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