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BIOLOGY
आवृतबीजी पौधो में लैंगिक जनन पर विस्तृत ...

आवृतबीजी पौधो में लैंगिक जनन पर विस्तृत टिप्पणी कीजिए

लिखित उत्तर

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पृथ्वी पर जीवन के रूप में प्राथमिक उत्पादक (primary producer), द्वितीयक उत्पादक (secondary producer) तथा अपघटक (decomposer) आदि, मिलते हैं। इनके मध्य ही ऊर्जा का प्रवाह होता है। द्वितीयक उत्पादक उपभोक्ता भी होते हैं, जैसे-शाकाहारी, मांसाहारी, सर्वाहारी आदि।
पादपों से भोजन ग्रहण करने वाले तथा पादप परजीवी जैसे कवक, जीवाणु आदि भी शाकाहारी उपभोक्ता होते हैं। पादप परजीवी जैसे सिस्टोपस, फाइटोप्थोरा, पक्सीनिया आदि शाकाहारी उपभोक्ता कहलाते हैं।
परभक्षण
(Predation)
जब एक जाति के जीव दूसरे जीव को अथवा दूसरी जाति के जीव को अपने भोजन के लिए मारकर उपयोग में लाते हैं तो उस स्थिति को परभक्षण कहते हैं। मारने वाला जीव परभक्षी (predator) अथवा शिकारी कहलाता है तथा मरने वाला जीव भक्ष्य (prey) अथवा शिकार कहलाता है।
परभक्षी विभिन्न प्रकार से वर्गीकृत किए गए हैं-
1. शाकाहारी (Herbivores)-ये जीव पौधों को खाकर जीवित रहते हैं, जैसे-कीट, गाय, हिरन, हाथी आदि। अत्यधिक शोषण के कारण कभी-कभी सम्पूर्ण पादप भी नष्ट हो जाता है। सामान्यतः पौधे के कोमल अंग, पत्ती, फूल का मकरन्द व फल आदि अधिक खाए जाते हैं। पौधे के काष्ठीय भाग को केवल कवक व दीमक ही खा सकते हैं। कुछ कीट भी इसमें छेद करते हैं। पत्तियाँ मुख्यत: चरने वाले पशुओं या कुतरने वाले कीटों द्वारा, पराग (मकरन्द) मुख्यतः कीटों, मधुमक्खियों, तितलियों द्वारा, फलं व बीज पक्षियों, जन्तुओं व मानव द्वारा प्रयोग में लाए जाते हैं।
2. मांसाहारी (Carnivores): ये जीव,शाकाहारी को खाते हैं। सामान्यतः ये जन्तु होते हैं, जैसे-कीट, पक्षी, सरीसृप, स्तनधारी आदि। सामान्यतः परभक्षी अपने शिकार की अपेक्षा अधिक चतुर होते हैं।
शिकारी व शिकार के भोजन ग्रहण की विधि के अनुसार तीन प्रकार के परभक्षी होते हैं-
(i) एकाहारी (Monophagous)-केवल एक प्रकार का शिकार करते हैं।
(ii) अल्प भक्षी (Oligophagous)-5 या 6 प्रकार के शिकारों का भक्षण कर सकते हैं।
(iii) विविध भक्षी (Polyphagous)-अलग-अलग प्रकार के शिकारों का भक्षण करते हैं।
यदि समुदाय में एकाहारी की संख्या बढ़ जाए तो यह विशिष्ट प्रकार के शिकार (prey) का अधिक होना दर्शाता है क्योंकि एकाहारी केवल उसी प्रकार के शिकार पर ही निर्भर होते हैं।
शिकारी व शिकार में अन्तर्सम्बन्ध
(Inter-relationship between Predator and Prey)
शिकारी (परभक्षी) की संख्या शिकार (prey) से कम होती है। शिकारी शिकार को खाकर उसकी जनसंख्या को प्रभावित करता है, परन्तु यदि शिकारी एकाहारी है तो एक समय ऐसा भी आ सकता है जब शिकार की संख्या नगण्य हो जाए और शिकारी को भूखा रहना पड़े, परन्तु फिर खाने के अभाव में जब शिकारी मरने लगता है तो एक बार फिर शिकार की संख्या में वृद्धि होती है। इस प्रकार वातावरण में शिकारी व शिकार की संख्या का घनत्व सन्तुलित होता रहता है। परभक्षी केवल शिकार ही नहीं करता है, बल्कि किसी दूसरे परभक्षी का शिकार भी बन सकता है जैसे मेढक कीटों का भक्षण करता है, परन्तु साँप मेढकों का भक्षण करते हैं। इस प्रकार पारितन्त्र में विभिन्न पोषी स्तरों में सन्तुलन बना रहता है।
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