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BIOLOGY
पौधों के लिए जल का क्या महत्त्व है?...

पौधों के लिए जल का क्या महत्त्व है?

लिखित उत्तर

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पर्यावरणीय कारक प्राणियों और पौधों की आकारिकी, कार्यिकी,जीवन-चक्र एवं व्यवहार को प्रभावित करते हैं। पर्यावरणीय कारक उनके जैव विकास को प्रभावित करते हैं। निम्नलिखित पर्यावरणीय कारक जीवधारियों को प्रभावित करते हैं-
1. प्रकाश (Light)-सूर्य के दृश्य प्रकाश (390-790 nm) में सात रंग होते हैं। दृश्य प्रकाश का नीला तथा लाल रंग प्रकाश संश्लेषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पराबैंगनी किरणें पौधों पर हानिकारक प्रभाव डालती हैं। अवरक्त विकिरण (infra-red radiation) प्रकाश के तापन प्रभाव को बढ़ाते हैं। प्रकाश पर्णहरित निर्माण के लिए आवश्यक है। बीजों के अंकुरण, रन्ध्रों के खुलने एवं बन्द होने, ऊतक विभेदन, वृद्धि, विकर निर्माण, पादप हॉर्मोन्स, पादप गति, पुष्पन आदि में प्रकाश महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पुष्पन पर प्रकाश के प्रभाव को दीप्तिकालिता कहते हैं।
2. तापमान (Temperature)-पादप और प्राणियों की कार्यिकी एवं व्यवहार में ताप महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तापमान एन्जाइम्स को प्रभावित करके जैविक क्रियाओं को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। पुष्पन, वृद्धि, फल निर्माण, बीजों का अंकुरण, श्वसन, प्रकाशसंश्लेषण आदि क्रियाएँ तापमान से प्रभावित होती हैं। पुष्पन पर ताप के प्रभाव को वसन्तीकरण (vernalization) कहते हैं।
3. जल, वर्षा, आर्द्रता (Water, Rain, Humidity)-जल जीवद्रव्य का प्रमुख घटक है। वर्षा, आर्द्रता आदि पौधों की जैविक क्रियाओं पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती हैं। पृथ्वी की सतह तथा वातावरण के बीच दो क्रमिक घटनाएँ अवक्षेपण तथा वाष्पोत्सर्जन होती हैं। इसके फलस्वरूप जल-चक्र नियमित चलता रहता है। भूमि में उपस्थित खनिज लवण जल में घुलकर मृदा घोल (soil solution) बनाते हैं। मृदा घोल से पोषक तत्त्वों का अवशोषण सुगमता से हो जाता है। जल विभिन्न जैविक क्रियाओं का माध्यम है। जल सार्वत्रिक घोलक है। जल की उपस्थिति के आधार पर पौधे जलोद्भिद्, समोद्भिद्, मरुद्भिद्, लवणोद्भिद्, उपरिरोही आदि समूहों में वर्गीकृत किए जाते हैं। कुछ पौधे जैसे क्रिप्टोगैम्स (cryptogams), ऑर्किड्स (orchids), मॉस (mosses), लाइकेन (lichens) आदि वायुमण्डल की आर्द्रता का उपयोग करने में समर्थ होते हैं।
4. वायु (Wind)-यह एक महत्त्वपूर्ण कारक है। वायु का प्रभाव अधिक दबाव से कम दबाव की ओर होता है। वायुदाब में भिन्नता का मुख्य कारण असमान ऊष्मन है। भूमध्य रेखा के समीप का क्षेत्र अधिक गर्म होता है, वायु का दबाव भी कम होता है, अतः वायु का प्रवाह ठण्डे उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों से भूमध्य रेखा की ओर होता है। ऊँचे पहाड़ों तथा समुद्री तट पर सदैव तेज वायु पौधों की आकारिकी तथा कार्यिकी को प्रभावित करती है। तीव्र वायु के कारण मृदा का वायु अपरदन .होता है। वायु परागण एवं प्रकीर्णन में सहायक होती है। तीव्र वायु वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करती हैI
5. मृदा (Soil)-यह पौधों के वितरण को प्रभावित करती है। मृदा के मुख्य घटक खनिज लवण, कार्बनिक पदार्थ, जल तथा वायु हैं। रेतीली मृदा में वायु संचार अच्छा होता है, लेकिन इसमें जलधारण क्षमता नहीं होती। इसके विपरीत चिकनी मृदा की जलधारण क्षमता अधिक होती है, लेकिन इसमें वायु संचार अच्छा नहीं होता। कृषि के लिए दोमट मृदा उपयुक्त होती है। कार्बनिक पदार्थ मृदा की जलधारण क्षमता एवं वायु संचार को बढ़ाते हैं।
6. स्थलाकृतिक कारक (Topographic Factors)-किसी स्थान की ऊँचाई, पर्वत की दिशा, ढलान की प्रवणता आदि पौधों के वितरण को प्रभावित करते हैं।
7.जैवीय कारक (Biotic Factors)-प्रकृति में.जन्तु और पादप साथ-साथ रहते हैं। ये एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। पौधों में परागण, बीज व फलों का प्रकीर्णन, पशुचारण, सहजीवन, परजीविता, वृक्षों का कटना, आग लगना आदि क्रियाएँ प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वनस्पतियों एवं प्राणियों को प्रभावित करती हैं।
8. सूक्ष्मजीव (Micro Organisms)-मृदा में मिलने वाले सूक्ष्मजीव तथा पौधों के मध्यं परस्पर सम्बन्ध निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
(i) कवकमूल (Mycorrhiza)-कवक तथा उच्च श्रेणी के पौधों के मध्य सम्बन्ध को कहते हैं।
(ii) सहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकारक जीवाणु (Symbiotic Nitrogen fixing Bacteria)-सहजीवी जीवाणु राइजोबियम वातावरण की स्वतन्त्र नाइट्रोजन को नाइट्रोजन यौगिक के रूप में स्थिर करता है।
(iii) प्रतिजीविता (Antibiosis)-जब एक जीव का अन्य जीव द्वारा किसी पदार्थ या वातावरण को बदलकर, सम्पूर्ण या आंशिक संदमन (inhibition) होता है तो इसे प्रतिजीविता कहते हैं। कुछ सूक्ष्मजीव विरोधी रसायन का स्रावण करते हैं। इन रसायनों को प्रतिजैविक कहते हैं।
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