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प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के 5 मुख्...

प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के 5 मुख्य समूहों के बारे में लिखे | इनके कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि /बागवानी में इनके प्रयोग के बारे में लिखे |

लिखित उत्तर

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पी.जी.आर. (Plant growth regulator - PGR) के पांच प्रमुख समूहों में प्रत्येक की खोज मात्र एक संयोग है। इसका प्रारम्भ चार्ल्स डारविन व उनके पुत्र फ्रांसिस डारविन के अवलोकन से हुआ जब उन्होंने देखा कि कनारी घास का प्रांकुर चोल (coleoptile) एक पावी प्रदीपन के प्रति अनुक्रिया करता है और प्रकाश के उद्गम की ओर वृद्धि (प्रकाशानुवर्तन) करता है। ऑक्सिन की खोज एफ.डब्ल्यू. वेट (FW. Went) के द्वारा जई के अंकुर के प्रांकुर चोल शिखर से की गई है।
.बैकेन. (Foolish seedling) धान के पौधे (नवोद्भिद) की बीमारी है जो रोगजनक कवक जिवेरेला फूजीकोराई के द्वारा होती है। ई. कुरोसोवा (जापानी वैज्ञानिक) ने रोगरहित धान के पौधों पर इस कवक से निष्कर्षित रस को छिड़का जिससे उनमें रोग उत्पन्न हो गया। इस तत्व की पहचान बाद में जिव्धेरेलिक अम्ल के रूप में हुई|
एफ, स्कूग (E. Skoog) तथा उनके सहकर्मियों ने देखा कि तम्याकू के तने के अंतरपर्व (intranodal) खंड से अविभेदित कोशिकाओं का समूह तभी प्रचुरित हुआ जब ऑक्सिन के अतिरिक्त माध्यम (medium) में, वाहिका ऊतकों के सत्व या यीस्ट सत्व या नारियल दूध या DNA पूरक रूप में दिया गया। स्कूग और मिलर ने साइटोकाइनेसिस (cytokinesis) को बढ़ावा देने वाले इस तत्व को पहचाना और इसका क्रिस्टलीकरण किया तथा काइनेटिन नाम दिया।

1960 के मध्य में तीनों अलग-अलग वैज्ञानिकों ने स्वतंत्र रूप से तीन प्रकार के निरोधक का शुद्धिकरण एवं उनका रासायनिक स्वरूप प्रस्तुत किया। ये निरोधक बी, विलगन II एवं डोरमिन हैं। बाद में ये तीनों रासायनिक रूप से समान पाए गए। इसका नामकरण एसिसिक अम्ल के रूप में किया गया।
कौसस ने यह बताया कि पके हुये संतरों से निकला हुआ एक वाष्पशील तत्व पास में रखे बिना पके हुए केलों को शीघ्रता से पकाता है। बाद में यह वापशील तत्व एथोलिन नाम से जाना गया जो एक गैसीय पीजीआर है।
पादप वृद्धि नियामकों का कायकीय शरीर क्रियात्मक प्रभाव ऑक्सिस (Anxins)-सर्वप्रथम मनुष्य के मूत्र से निकाला गया। वर्तमान में ऑक्सिन्स IAA एवं Indol butyric acid पौधों से निकाला गया है। NAA (Naphthaline acetic acid) तथा 2, 4-D (2,4डाईक्लोरो फिनोक्सी ऐसेटिक अम्ल) कृत्रिम ऑक्सिन्स हैं। ऑक्सिन्स के उपयोग का एक विस्तृत दायरा है और ये बागवानी एवं खेती में प्रयोग किये गये हैं। ये तनों की कटिंग (कलमों) में जड़ फूटने (rooting) में सहायता करती हैं जो पादप प्रवर्धन में व्यापकता से प्रयोग होती हैं। क्सिन्स पुष्पन को बढ़ा देता है, जैसे अनन्नास माय पीधा के पत्तों एवं फलों को शुरुआती अवस्था में गिरने से बचाते हैं तथा पुरानी एवं परिपक्व पत्तियों एवं फलों के विलगन को बढ़ावा देते हैं। ऑक्सिया अनिषेकफलन को प्रेरित करता है जैसे कि टमाटर में। 2, 4-0 व्यापक रूप से द्विवीजपत्री खरपतवारों का नाश कर देता है। ऑक्सिन्स जाइलम विभेदन को नियंत्रित करने तथा कोशिका के विभाजन में सहायता करता है। उच्च पादपों में वृद्धि करती अग्रस्थ कलिका पायं (कक्षस्थ) कलियों की वृद्धिको अवधित करता है जिसे शिखाग्र प्राधान्यता (apical dominance) कहते हैं। प्ररोह सिरों को हटाने से पाचं कलियों की वृद्धि होती है ।
जिब्बेरेलिंस (Gibberellins)-यह अन्य प्रकार का प्रोत्साहक पीजीआर है। सौ से अधिक जिमेरेलिंस की सूचना विभिन्न जीवों (कवकों व उच्च पादपों) से प्राप्त हो चुकी है। इन्हें `GA_1, GA_2, GA_3`, से नामित किया गया है। `GA_3` की सबसे पहले खोज हुई थी। सभी जिब्रेलिंस अम्लीय होते हैं। ये पौधों में एक व्यापक दायरे की कायिकीय अनुक्रिया देते हैं। ये अक्ष की लम्बाई बढ़ाने की क्षमता रखते हैं, अत: अंगूर के डंठल की लम्बाई बढ़ाने में प्रयोग किये जाते हैं। जिओरेलिंस सेव जैसे फलों को लम्बा बनाते हैं ताकि वे उचित रूप ले सकें। ये जरावस्था को भी रोकते हैं, ताकि फल पेड़ पर अधिक समय तक लगे रह सकें और बाजार में मिल सकें। `GA_3` को आसव (शराब) उद्योग में माल्टिंग की गति बढ़ाने के लिये उपयोग किया जाता है। गने के तने में कार्बोहाइड्रेट्स चीनी या शर्करा के रूप में एका रहता है। गामे की खेती में जिबरेलिंस छिड़कने पर तनों की लम्बाई बढ़ती है। इससे 20 टन प्रति एकड़ ज्यादा उपज बढ़ जाती है। GA छिड़कने पर किशोर शंकुवृक्षों में परिपक्वता तीव्र गति से होती है अतः बीज जल्दी ही तैयार हो जाता है। जिब्रेलिस चुकंदर, पत्तागोभी एवं अन्य रोजेटी स्वभाव वाले पादपों में वोल्टिंग (पुष्पन से पूर्व अंत:पर्व का दीर्धीकरण) को बढ़ा देता है ।
साइटोकाइनिस (Cytokinins)-साइटोकाइनिन्स अपना विशेष प्रभाव कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis) में डालता है और इसे काइनेटिन (एडेनिन का रूपान्तरित रूप एक प्यूरीन) के रूप में आटोक्लेवड़ हेरिंग (एक प्रकार की मछली) के शुक्राणु से खोजा गया था। काइनेटिन पौधों में प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता है। साइटोकाइनिन्स जैसे पदार्थों की खोज के क्रम में मक्का की अष्ठि तथा नारियल दूध से जियाटीन पृथक किया जा सका। प्राकृतिक साइटोकाइनिन्स उन क्षेत्रों में संश्लेषित होता है, जहाँ तीन कोशिका विभाजन सम्पन्न होता है, उदाहरण के लिये मूल शिखान, विकासशील प्ररोह कलिकाएँ तथा तरुणफल आदि। यह नई पत्तियों में हरितलवक, पार्श्व प्ररोह वृद्धि तथा अपस्थानिक प्ररोह संरचना में मदद करता है। साइटोकाइनिन्स शिखाग्र प्राधान्यता से छुटकारा दिलाता है। पोषकों के संचारण को बढ़ावा देते हैं जिससे पत्तियों की जरावस्था को देरी करने में मदद मिलती है।
एथीलिन (Ethylene)-यह एक साधारण गैसीय पीजीआर है। यह जरावस्था को प्राप्त होते ऊतकों तथा पकते हुए फलों के द्वारा भारी मात्रा में संश्लेषित की जाती है। एथीलिन पौधों की अनुप्रस्थ वृद्धि, अक्षों में फुलाव एवं द्विबीजी नवोद्भिदों में अंकुश संरचना को प्रभावित करती है। एथीलिन जरावस्था एवं विलगन को मुख्यतः पत्तियों व पुष्पों में बढ़ाती है। यह फलों को पकाने में बहुत प्रभावी है। फलों के पकने के दौरान यह श्वसन की गति की वृद्धि करती है। श्वसन वृद्धि में गति की इस बढ़त को क्लाइमैक्टिक श्वसन कहते हैं।
एथोलिन बीज तथा कलिका प्रसुप्ति को तोड़ती है, मूंगफली के बीज में अंकुरण को शुरू करती है तथा आलू के कंदों को अंकुरित करती है। एथीलिन गहरे जल के धान के पौधों में पर्णवन्त को तीन दीर्थीकरण के लिये प्रोत्साहित करता है। यह पत्तियों तथा प्ररोह के ऊपरी भाग को जल से ऊपर रखने में मदद करती है। एथीलिन मूल वृद्धि तथा मूल रोमों को प्रोत्साहित करती है, अतः पौधे को अधिक अवशोषण क्षेत्र प्रदान करने में मदद करती है। अनन्नास को फूलने तथा फल समकालिकता में सहायता करती है। टमाटर एवं सेब के फलों के पकाने की गति को बढ़ाती है तथा फूलों एवं फलों में विलगन को तीव्रता प्रदान करती है। खीरों में मादा पुष्यों को बढ़ाती है।
एब्सिसिक अम्ल (ABA)-यह एक सामान्य पादप वृद्धि तथा पादप उपापचय के निरोधक का कार्य करता है। ABA बीज के अंकुरण का निरोध करता है। रंधों के बंद होने को प्रोत्साहित करता है तथा पौधों को विभिन्न प्रकार के तनावों को सहने हेतु क्षमता प्रदान करता है। ABA बीज के विकास, परिपक्वता, प्रसुप्ति आदि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बीज को जल शुष्कन तथा वृद्धि के लिये अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाता है।
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