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रुधिर वर्ग से आप क्या समझते हैं? मनुष्य ...

रुधिर वर्ग से आप क्या समझते हैं? मनुष्य में यह कितने प्रकार के होते हैं? रुधिर आधान की व्याख्या कीजिए तथा इसमें रुधिर वर्ग की भूमिका का उल्लेख कीजिए।

लिखित उत्तर

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मानव रुधिर वर्ग
कार्ल लैण्डस्टीनर (Karl Landsteiner, 1902) ने रुधिर वर्गों का पता लगाया। लाल रुधिराणु की कोशिकाकला पर प्रतिजन (antigen) तथा प्लाज्मा में प्रतिरक्षी (antibodies) पाया जाता है। प्रतिजन (antigens) दो प्रकार के होते हैं-.ए. तथा .बी. (A and B) एवं रुधिर प्रतिरक्षी (antibodies) भी दो प्रकार के ही होते हैं .a. तथा .b.1 .ए.-प्रतिजन .ए. प्रतिरक्षी की उपस्थिति में तथा .बी. प्रतिजन .बी. प्रतिरक्षी की उपस्थिति में अत्यधिक चिपचिपे (sticky) हो जाते हैं। अतः लाल रुधिर कणिकाएँ (RBCs) आपस में चिपकने लगती हैं जिसे अभिश्लेषण (clumping or agglutination) कहते हैं। प्रतिजनों (antigens) तथा प्रतिरक्षी की उपस्थिति के आधार पर रुधिर को चार रुधिर वर्गों (blood groups) में बाँटते हैं-

रुधिर वर्गों की वंशागति
रुधिर वर्ग की वंशागति मेण्डल के नियमों के अनुसार होती है। रुधिर वर्गों को स्थापित करने वाले प्रतिजन (antigens) तथा उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति के लिए यहाँ तीनजीन्स होते हैं। प्रतिजन .A. के लिए जीन, `alpha^(a)` प्रतिजन .B. के लिए `alpha^(b)` तथा दोनों प्रतिजनों की अनुपस्थिति के लिए जीन `alpha^(@)` उत्तरदायी माने जाते हैं। इस प्रकार, एक मुनष्य में इनमें से कोई दो अथवा एक ही प्रकार के दो जीन्स का जोड़ा समजातं गुणसूत्रों (homologous chromosomes) के निश्चित स्थल (loci) में स्थित होते हैं। जीन `alpha^(a)` तथा `alpha^(b)` सहप्रभावी (codominant), अर्थात् दोनों की उपस्थिति एक-दूसरे पर कोई प्रभाव नहीं डालती है, किन्तु `alpha^(a)` तथा `alpha^(b)` क्रमशः `alpha^(@)` पर प्रभावी होते हैं अर्थात् `alpha^(@)` अन्य दोनों जीन्स के लिए अप्रभावी (recessive) होता है। अत: किसी मनुष्य की रुधिर वर्गों के लिए जीनी रचना निम्नांकित तालिका के अनुसार हो सकती है -

उपर्युक्त के अनुसार तथा मेण्डल के वंशागति सिद्धान्त को ध्यान में रखकर माता-पिता से शिशु में रुधिर वर्ग के अवतरण को ज्ञात किया जा सकता है।
उदाहरण-A तथा B रक्त वर्ग वाले माता-पिता की सम्भावित सन्तानों के रुधिर वर्गों को निम्नांकित रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित कर सकते हैं-

रुधिर वर्गों की वंशागति का महत्त्व (Importance of Inheritance of Blood Groups)--रुधिर वर्गों के जीनोटाइप के अंवतरण से (मेण्डल के नियमानुसार) सम्भावित माता-पिता या शिशु का पता लगाना एक आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण जानकारी है। इससे चिकित्सा कानून के मुकदमों (medico legal suits) में सहायता मिलती है। इससे विवादास्पद पितृत्व का सही ज्ञान हो सकता है। रुधिर दान (blood donation) के लिए लगाए गए कैम्पों में रक्त को एकत्र करके रक्त वर्गों के अनुसार वर्गीकृत करके सुरक्षित रखा जाता है।
रुधिर आधान (Blood. Transfusion)-रक्त आधान से पूर्व यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि रक्त प्रापक (recipient) और रक्तदाता (donor) का रक्त एक ही वर्ग का हो। बिना सुमेलन (matching) के रक्ताधान करने पर कभी-कभी रक्त का थक्का बनने से प्रापक की मृत्यु हो जाती है। कार्ल लैण्डस्टीनर ने रक्ताधान की असफलता के कारणों का पता लगाया था।
रक्तदाता के रक्त प्लाज्मा में पायी जाने वाली प्रतिरक्षी (antibodies) का प्रापक के लाल रुधिराणुओं पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि रक्त आधान में प्रापक के प्लाज्मा की मात्रा अधिक होने से प्रतिरक्षी प्रभावहीन हो जाती है जैसे रक्त वर्ग .O. में प्रतिजन (antigens) के न होने से .O. रक्त वर्ग के लाल रुधिराणु किसी भी वर्ग के रुधिर की प्रतिरक्षी के साथ अभिश्लेषित नहीं होते। .O. रुधिर वर्ग का रुधिर किसी भी रुधिर वर्ग के व्यक्ति को दिया जा सकता है। अत: .O. रुधिर वर्ग के व्यक्ति सार्वत्रिक दाता (Universal Donor) कहलाते हैं। .O. रुधिर वर्ग के रुधिर प्लाज्मा में दोनों प्रकार के प्रतिरक्षी (antibodies) होते हैं। अत: इनको केवल .O. रुधिर वर्ग वाला रक्त ही दिया जा सकता है। AB. रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों में लाल रुधिराणुओं पर दोनों प्रकार के प्रतिजन (antigens) होते हैं और रुधिर प्लाज्मा में कोई भी प्रतिरक्षी नहीं होते हैं। अत: इनको किसी भी रुधिर वर्ग का. रुधिर दिया जा सकता है। .AB. रुधिर वर्ग वाले व्यक्ति सार्वत्रिक प्रापक (universal recipient) कहलाते हैं। .A. तथा .B. रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों को इन्हीं के रूधिर वर्ग वाले व्यक्ति का अथवा .O. रुधिर वर्ग वाले व्यक्ति का रुधिर दिया जा.सकता है।
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