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मानव जीनोम प्रोजेक्ट पर टिप्पणी लिखिए।...

मानव जीनोम प्रोजेक्ट पर टिप्पणी लिखिए।

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मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project) आनुवंशिक युग का प्रारम्भ वाटसन तथा क्रिक (1953) के द्वारा प्रस्तुत जानकारी से हुआ माना जा सकता है। इसके पश्चात् विभिन्न जीवों सहित मानव में जीन्स की खोज प्रारम्भ हो गई। इसके फलस्वरूप आनुवंशिक इन्जीनियरिंग अस्तित्व में आयी जिसकी सहायता से जीन संरचना में परिवर्तन सम्भव हुआ। इससे चिकित्सा जगत में एक नई प्रणाली .जीन चिकित्सा अस्तित्व में आयी। यह चिकित्सा आनुवंशिक तथा अन्य घातक रोगों से मुक्ति दिला सकती है। यह सर्वविदित ही है कि सभी रोगों के लिए कोई न--कोई जीन उत्तरदायी होता है। जीन संरचनाओं को जानने के लिए सन् 1990 में अमेरिका सरकार ने मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project) प्रारम्भ की। इसका उद्देश्य मानव के सम्पूर्ण जीनोम के D.N.A. क्रम को निर्धारित करना था। 1993 में अमेरिका में राष्ट्रीय मानव जीनोम अनुसन्धान संस्थान (National Human Genome Research Institute: NHGRI) की स्थापना हुई। इसे अमेरिकी ऊर्जा विभाग व राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान द्वारा सहयोग प्राप्त था।आनुवंशिकता एवं मानव चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में 26 जून, 2000 स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया, क्योंकि इस दिन मानव जीनोम परियोजना के अध्यक्ष डॉ० फ्रान्सिस कोलिन्स (Dr. Francis Collins) और सेलेरा जीनोमिक्स (Celera Genomics) के जे० क्रेग वेंटर (Dr. J.Craig Venter) ने संयुक्त रूप से मानव जीनोम की संरचना का मॉडल प्रस्तुत किया। मानव जीनोम परियोजना के उद्देश्यों के विस्तार एवं आवश्यकता को देखते हुए इसे महायोजना (megaproject) कहा गया है। मानव जीनोम में लगभग `3 xx 10^@` क्षार युग्म पाए जाते हैं। इनके अनुक्रमों का पता लगाने के लिए लगभग 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च होंगे। इनके अनुक्रमों को टंकणित कराकर पुस्तक के रूप में संगृहीत किया जाए तो 1000-1000 पृष्ठ की लगभग 8300 पुस्तकों की आवश्यकता होगी जिनमें एक मानव कोशिका के डी० एन० ए० की सूचनाएँ संकलित होंगी। इन आंकड़ों के संग्रह, विश्लेषण एवं पुन: उपयोग के लिए उच्च गतिकीय संगणक.साधनों (high speed computational devices) की आवश्यकता होगी। मानव जीनोम परियोजना के लक्ष्य (Goals of Human Genome Project) (1) लगभग 30,000 से 35,000 मानव जीन्स की पहचान करना। (2) मानव डी० एन० ए० को बनाने वाले लगभग 3 बिलियन रासायनिक क्षार युग्मों के अनुक्रमों को निर्धारित करना। (8) जीनोम सम्बन्धी आँकड़ों को संगृहीत करना और विश्लेषण हेतु आधुनिकतम तीन, अधिक प्रभावी क्रम तकनीक विकसित करना। (4) योजना के फलस्वरूप उठने वाली सामाजिक (social), नैतिक (ethical) एवं कानूनी समस्याओं (legal issues) पर विचार करना। (5) मानव जीनोम में पाए जाने वाले जेनेटिक मार्करों को निर्धारित करना ताकि जीनोम का आनुवंशिकं चित्रण तथा भौतिक चित्रण तैयार किया जा सके। (6) विभिन्न रोगों की पहचान करके उनके निदान करना। मानव जीनोम परियोजना की उपलब्धियाँ या विशेषताएँ (Salient features of Human Genome Project) मानव जीनोम परियोजना से प्राप्त मुख्य उपलब्धियाँ निम्नवत् हैं (1) मानव जीनोम में 3164.7 करोड़ न्यूक्लियोटाइड्स मिलते हैं। (2) प्रत्येक जीन में औसतन 3000 न्यूक्लियोटाइड्स होते हैं, इनके आकार में विभिन्नताएँ पायी जाती हैं। (8) मनुष्य की ज्ञात सबसे बड़ी जीन डिस्ट्रॉफिन (dystrophin) में 2.4 करोड़ न्यूक्लियोटाइड्स पाए जाते हैं। (4) जीन की संख्या लगभग 30,000 से 31,000 है। लगभग 99.9 प्रतिशत व्यक्तियों के न्यूक्लियोटाइड्स समान होते हैं। (5) ज्ञात जीन्स में से लगभग 50% के कार्यों की जानकारी प्राप्त हो गई है।
(6) ज्ञात जीनोम में से लगभग 2% प्रोटीन का कूटलेखन करते हैं। (7) पुनरावृत्ति अनुक्रम (नॉनकोडिंग डी० एन० ए०) जीनोम का अधिकांश भाग बनाता है। इनकी सौ से हजारों बार तक पुनरावृत्ति होती है। (8) मानव में अनुक्रमित किए जाने वाला प्रथम गुणसूत्र 22वाँ जोड़ा है। यह मानव गुणसूत्रों का सबसे छोटा जोड़ा है। 22वें जोड़े गुणसूत्र पर 272 वास्तविक जीन्सं तथा 134 कूट जीन्स उपस्थित है। (9) प्रथम गुणसूत्र पर सर्वाधिक जीन (2968) और Y गुणसूत्र में सबसे कम जीन (231) पाए जाते हैं। (10) वैज्ञानिकों ने मानव में लगभग 1.4 करोड़. स्थानों पर एकल न्यूक्लियोटाइड बहुरूपता (single nucleotide polymorphism) का पता लगाया है। जिसकी सहायता से रोग सम्बन्धी जीन को पहचाना जा सकता है। (11) रोग सम्बन्धित जीन्स में अनुक्रमों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त हुई है। मानव जीनोम परियोजना का महत्त्व (Importance of Human Genome Project). मानव जीनोम परियोजना से सन् 2050 तक जीनोमिक्स या जीनोम विज्ञान एक उपयोगी विद्या के रूप में स्थापित हो जाएगा। इससे सबसे अधिक लाभ निःसन्देह जीन चिकित्सा के क्षेत्र में होगा। अभी तक हुए शोध कार्य से छह हजार से अधिक आनुवंशिक विकारों का पता लगाया जा चुका है। जीनोम विज्ञान के कारण जन्म के तुरन्त पश्चात् शिशु की जीनोम संरचना का पता लगाकर इसके आनुवंशिक विकारों को बचपन में ही दूर करना सम्भव हो जाएगा। इसके लिए डी० एन० ए० टीका बनाने के लिए शोध कार्य प्रारम्भ हो चुके हैं। इस परियोजना के कारण जीन के विकास पर पर्यावरण के प्रभाव का ज्ञान भी हो सकेगा। डॉ० कोलिन्स का मानना है कि सन् 2020 तक कुछ सामान्य रोगों के लिए जीन चिकित्सा प्रणाली स्थापित हो जाएगी। कैंसर, एड्स (AIDS) जैसे रोगों के उपचार हेतु व्यक्ति विशेष की आनुवंशिक संरचना के अनुसार औषधियाँ तैयार हो सकेंगी इसके अतिरिक्त अन्य जीवों के डी० एन० ए० अनुक्रमों की जानकारी के आधार पर उनकी प्राकृतिक क्षमताओं का उपयोग करके स्वास्थ्य, सुरक्षा, कृषि, ऊर्जा उत्पादन व पर्यावरण सुधार की दिशा में उठने वाली चुनौतियों को हल किया जा सकेगा।
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