धातु उत्प्रेरक की सतह पर होने वाले विषमांगी उत्प्रेरण में अधिशोषण का सिद्धान्त अधिशोषण की भूमिका को स्पष्ट करता है। प्राचीन मत के अनुसार, अधिकारी अणुओं, जो सामान्यतया अनुसार गैसीय प्रावस्था में होते हैं, विलयन में अभिकारक ठोस उत्प्रेरक के पृष्ठ पर पहुँच जाते हैं, तथा उनमें उपस्थित आबन्ध टूट जाते हैं। तत्पश्चात ये उत्प्रेरक की सतह पर अधिशोषित हो जाते हैं। अधिशोषण, ऊष्माक्षेपी होने के कारण, मुक्त ऊष्मीय ऊर्जा (अधिशोषण एन्थैल्पी) उत्प्रेरक की सतह पर रासायनिक सक्रियता को बढ़ाने में सहायता करती है। अधिशोषित अभिकारक परस्पर संयोग करके सक्रियित संकुल (activated complex) बनाते हैं। अन्ततः उत्प्रेरक की सतह से उत्पाद विशोषित हो जाते हैं तथा नए अभिकारी अणुओं का उत्प्रेरक की सतह पर स्थान प्राप्त हो जाता है।
यद्यपि यह सिद्धान्त उत्प्रेरक की अतिविशिष्टता को समझाने में असफल रहा। इसके लिए, प्राचीन मत को आधुनिक अधिशोषण सिद्धान्त (Modern absorption theory) से प्रतिस्थापित किया गया। आधुनिक अधिशोषण सिद्धान्त के अनुसार उत्प्रेरण क्रिया उत्प्रेरक की सतह पर केन्द्रित होती है। इस क्रियाविधि में पाँच पद सम्मिलित होते हैं
(i) उत्प्रेरक की सतह पर अभिकारकों का विसरण
(ii) उत्प्रेरक की सतह पर कुछ अभिकारक अणुओं का संयोजन अर्थात् अधिशोषण।
(iii) एकं मध्यवर्ती निर्माण द्वारा, उत्प्रेरक की सतह पर रासायनिक अभिक्रिया का होना।
(iv) उत्प्रेरक सतह से अभिक्रिया उत्पादों का वियोजन अर्थात् विशोषण होने के बाद सतह का दोबारा अधिक अभिक्रिया होने के लिए उपलब्ध कराना।
(v) अभिक्रिया उत्पादों का उत्प्रेरक की सतह से विसरणा
उत्प्रेरक की सतह पर मुक्त संयोजकताएँ (free valencies) होती हैं। ये स्थूल के आन्तरिक भाग में नहीं होती है। ये संयोजकताएँ रासायनिक आकर्षण बलों के लिए स्थान उपलब्ध कराती हैं। जब कोई गैस एक ऐसी सतह के सम्पर्क में आती है तो इसके अणु शिथिल रासायनिक संयोजन के कारण वहाँ बंध जाते हैं। यदि अलग प्रकार के अणु पास-पास अधिशोषित हो जाएँ तो . एक-दूसरे से अभिक्रिया कर सकते हैं जिससे नए अणु बन जाते हैं। इस प्रकार बने अणु सतह को नए अभिकारक अणुओं के लिए छोड़ते हुए वाष्पीकृत हो जाते हैं। इसे सूक्ष्म-विभाजित उत्प्रेरक, जैसे-निकिल की उपस्थिति में अत्यधिक बढ़ाया जा सकता है। यह सिद्धान्त स्पष्ट करता है कि अभिक्रिया के अन्त में उत्प्रेरक का द्रव्यमान एवं रासायनिक संघटन किस प्रकार अपरिवर्तित रहता है तथा यह कम मात्रा में भी किस प्रकार प्रभावी होता है।