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BIOLOGY
ऊष्माशोषी अभिक्रिया किसे कहते हैं ?...

ऊष्माशोषी अभिक्रिया किसे कहते हैं ?

लिखित उत्तर

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नाभिकीय विखण्डन में श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction in Nuclear Fission)-जब यूरेनियम `(""_(92)U^(235))` पर न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है तो यूरेनियम नाभिक दो लगभग बराबर खण्डों में टूट जाता है। विखण्डन की इस अभिक्रिया में 2 या 3 नए न्यूट्रॉन निकलते हैं तथा अपार ऊर्जा उत्सर्जित होती है। अनुकूल परिस्थितियों में ये नए न्यूट्रॉन अन्य यूरेनियम नाभिकों को विखण्डित कर देते हैं और प्रत्येक नाभिक के विखण्डन से 2 या 3 नए न्यूट्रॉन उत्पन्न होते हैं, जो अन्य नाभिकों का विखण्डन करते हैं। इस प्रकार नाभिकों के विखण्डन की श्रृंखला बन जाती है जो एक बार प्रारम्भ होने के पश्चात् स्वत: चालू रहती है और तब तक,चलती रहती है, जब तक कि समस्त यूरेनियम समाप्त नहीं हो जाता। इस प्रकार की अभिक्रिया को नाभिकीय विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया कहते हैं। चूंकि यूरेनियम के एक नाभिक के विखण्डित होने से लगभग 200 Mev ऊर्जा उत्पन्न होती है, अतः शृंखला अभिक्रिया में विखण्डित होने वाले नाभिकों की संख्या तेजी से बढ़ने के कारण उत्पन्न ऊर्जा बहुत शीघ्र ही अपार रूप धारण कर लेती है। श्रृंखला अभिक्रिया निम्नलिखित दो प्रकार की होती है (i) अनियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया—इस अभिक्रिया में प्रत्येक विखण्डन से उत्पन्न न्यूट्रॉनों में से औसतन एक से अधिक न्यूट्रॉन आगे विखण्डन करते हैं, जिसके कारण विखण्डनों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है, अत: यह अभिक्रिया अति तीव्र गति से होती है और कुछ क्षणों में सम्पूर्ण पदार्थ का विखण्डन हो जाता है। इससे ऊर्जा की बहुत अधिक मात्रा मुक्त होती है, चित्र-14.10 : नाभिकीय विखण्डन की शृंखला अभिक्रिया। जो भयानक विस्फोट का रूप ले लेती है। परमाणु बम में यही क्रिया होती है। (i) नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया इस अभिक्रिया में कृत्रिम विधियों द्वारा, (मन्दक एवं नियन्त्रक पदार्थों से) इस प्रकार का नियन्त्रण किया जाता है कि प्रत्येक विखण्डन से प्राप्त न्यूट्रॉनों में से केवल एक ही न्यूट्रॉन आगे विखण्डन कर सके। इस प्रकार, इसमें विखण्डनों की दर नियत रहती है, अत: यह अभिक्रिया धीरे-धीरे होती है तथा उत्पन्न ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक कार्यों में किया जा सकता है। नाभिकीय रिऐक्टर अथवा परमाणु-भट्टी में यही क्रिया होती है। शृंखला अभिक्रिया में कठिनाइयाँ तथा उनका निवारण श्रृंखला अभिक्रिया के प्रचलन में निम्नलिखित दो कठिनाइयाँ आती हैं (i) प्रथम कठिनाई यह है कि साधारण यूरेनियम में `U^(238)` तथा `U^(235)` दो आइसोटोप होते हैं। इनमें 8235 केवल 0.7% होता है, जबकि `U^(238)`99.3% होता है। जहाँ `U^(238)` केवल तीव्रगामी (ऊर्जा 1 Mev से अधिक) न्यूट्रॉनों द्वारा ही विखण्डित होता है, वहीं `U^(235)` मन्द न्यूट्रॉनों (ऊर्जा 0.025 ev) द्वारा ही विखण्डित हो जाता है, जबकि `U^(238)` आइसोटोप मन्द गति न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लेता है। प्राकृतिक यूरेनियम में U238 की मात्रा अधिक होने के कारण, विखण्डन क्रिया में उत्पन्न हुए न्यूट्रॉनों के U238 नाभिकों द्वारा अवशोषित कर लिए जाने की सम्भावना अधिक होती है। इससे विखण्डन की क्रिया शीघ्र ही रुक जाती है। इसलिए श्रृंखला अभिक्रिया को सम्पन्न करने के लिए प्राकृतिक यूरेनियम में विसरण विधि द्वारा `U^(235)` का अनुपात.बढ़ाया जाता है। इस क्रिया को यूरेनियम संवर्द्धन कहते हैं तथा इस प्रकार प्राप्त यूरेनियम को संवर्द्धित यूरेनियम कहते हैं। श्रृंखला अभिक्रिया को चलाने में द्वितीय कठिनाई यह है कि-`U^(235)` नाभिक के विखण्डन से प्राप्त न्यूट्रॉन की गति इतनी तीव्र होती है कि वे सीधे ही अन्य `U^(235)` नाभिकों का विखण्डन नहीं कर पाते। इसलिए विखण्डन में भाग लेने से पूर्व इन न्यूट्रॉनों को मन्दित करना होता है। इसके लिए विखण्डनीय पदार्थ को कुछ विशेष प्रकार के पदार्थों से घेरकर रखा जाता है। इन पदार्थों को मन्दक पदार्थ (moderators) कहते हैं। जब विखण्डन में उत्पन्न न्यूट्रॉन बार-बार मन्दक पदार्थ के अणुओं से टकराते हैं तो उनकी ऊर्जा कम होती जाती है। जब न्यूट्रॉनों की ऊर्जा 0.025ev तक कम हो जाती है तो वे `U^(235)` नाभिकों का विखण्डन करने लगते हैं। इस प्रकार शृंखला अभिक्रिया जारी रहती है।
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