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सर्वनाम...

सर्वनाम

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वाक्य शुद्धि की परिभाषा|वाक्य रचना संबंधी असुधियाँ|अन्विति के नियम|विशेष्य और विशेषण की अन्विति|सर्वनाम और संज्ञा की अन्विति|पदक्रम|अन्विति संबंधी अशुद्धियाँ|पदक्रम की अशुद्धियाँ|वाच्य की अशुद्धियाँ|संज्ञा, सर्वनाम और क्रिया के अशुद्ध प्रयोग|OMR

निर्देश: निम्नलिखित गद्यान्श के आधार पर प्रश्न तक के उत्तर दीजिए: ?"मानव के पास समस्त जगत को देखने-परखने के दो नजरिए हैं एक आशावादी, दूसरा निराशावादी। इसे सकारात्मक और नकारात्मक दृष्टि भी कहते हैं। जो आशावादी या सकारात्मक मार्ग पर चलते हैं, वे सदैव आनन्दकी अनुभूति प्राप्त करते हैं तथा निराशावादी या नकारात्मक दृष्टि वाले दुःख के सागर में डूबे रहते हैं और सदा अपने आपको प्रस्थापित करने के लिए तर्क किया करते हैं। वे भूल जाते हैं कि तर्क और कुर्तक से ज्ञान का नाश होता है एवं जीवन में विकृति उत्पन्न होती है। आशावादी तर्क नहीं करता, फलस्वरूप वह आंतरिक आनन्द की प्रतीति करता है। वह मानता है कि आत्मिक आनंद कभी प्रहार या काटने की प्रक्रिया में नहीं है। इसीलिए जगत में सदा आशावाद ही पनपा है, उसने ही महान व्यक्तियों का सृजन किया है। निराशावाद या नकारात्मकता की नींव पर कभी किसी जीवन प्रासाद का निर्माण नहीं हुआ। 'वे' सर्वनाम है

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये-- यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित थी। वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ घी और सामग्री की आहुतियाँ उसमें पड़ रही थी। सारे वातावरण में सुधि व्याप्त थी और वाजश्रव के चेहरे पर विशेष प्रसन्नता झलक रही थी। उसके द्वारा आयोजित यज्ञ की आज पुर्णाहुति जो थी। देश भर में बड़े-बड़े विद्वान और ऋषि मुनि पधारे थे। यज्ञ के उपरांत वाजश्रवा ब्राह्मणों को प्रभूत दक्षिणा देगा, ऐसा सभी सोच रहे थे। यज्ञ समाप्त हुआ। ब्राह्मणों ने बाजश्रवा को आशीर्वाद दिया और वाजश्रवा ने उन्हें दक्षिणा देना प्रारंभ किया। किंतु यह क्या। यज्ञ की इस अंतिम घड़ी में वाजश्रवा को किस मोह ने घेर लिया? कहाँ तो उसने निश्चय किया था कि यज्ञ की समाप्ति पर वह अपनी सारी संपति दान कर देगा और कहाँ दक्षिणा में दान देने लगा ऐसा निर्बल और बूढ़ी गाएँ जिन्होंने दूध देना ही बंद कर दियाथा। यह बात 'नचिकेता' को अच्छी नहीं लगी। किंतु यह क्या? वाक्य में कौनसा सर्वनाम है

नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए: समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमें लोक संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होता। दूसरे, भले ही आप अपने सामने एक ऊँचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज़ इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। आप इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व हास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं।" वाक्य में 'वे' सर्वनाम किसके लिए आया है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमे लोक-संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होते। दूसरे, भले ही आप अपने सामने एक ऊँचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। आप इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। ''वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले है।'' वाक्य में 'वे' सर्वनाम किसके लिए आया है?

निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। समूची स्वार्थी व अहं-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमें लोक-संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होते। दूसरे, भले ही आपके सामने एक ऊँचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। आप इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। "वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले है।" वाक्य में 'वे' सर्वनाम किसके लिए आया है ?

समूची स्वार्थी व अह-प्रेरित प्रवृत्तियाँ नकारात्मक हैं, ऐसे कर्मों में ऊँचे उद्देश्य नहीं होते, उनमें लोक-संग्रह नहीं होता, भव्य आदर्श नहीं होते। दूसरे, भले ही आपके सामने एक ऊंचा आदर्श रखें, तो भी आपके कर्म यदि आपके मन के चाहे या अनचाहे से प्रेरित हैं तो वे ह्रासमान ही होंगे, क्योंकि पसंद-नापसंद से किए जाते कार्य वासनाओं को बढ़ाए बिना नहीं रहते। कोई काम आपको महज इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि वह आपको पसंद है। उसी तरह कोई काम करने से आपको महज इस आधार पर नहीं कतराना चाहिए कि वह काम आपका मनचाहा नहीं है। कार्य का निर्णय बुद्धि-विवेक के आधार पर होना चाहिए, 'मनचली भावनाओं, तुनकमिजाजी के आधार पर कतई नहीं। इस एक बात को हमेशा याद रखिए कि पसंद और नापसंद आपके सबसे बड़े शत्र हैं। शm इन्हें पहचानते तक नहीं। उल्टे आप इन्हें पाल-पोसकर दुलारते हैं। वे तो हर क्षण आपकी हानि व ह्रास करने पर ही तुले हैं। इनसे निबटने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि अपनी रुचि और अरुचि का विश्लेषण करें। ''वे तो हर क्षण आपको हानि व ह्रास करने पर ही तुले है।" वाक्य में ', सर्वनाम किसके लिए आया है?