अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction)-इस जनन प्रक्रिया में केवल एक ही जीव भाग लेता है। इसमें युग्मकों (gametes) का निर्माण नहीं होता। इसमें बनने वाली जनन इकाई वृद्धि एवं विभाजन द्वारा नयी संतति का निर्माण करती है। इसमें संतति का आनुवंशिक संगठन जनक जीव के समान होता है।
एकल जनक से प्राप्त सभी सन्ताने सामान्यतया आकारिकीय एवं आनुवंशिक लक्षणों में समान अर्थात् क्लोन (clone) होती हैं।
अलैंगिक जनन की प्रमुख सामान्य विधियाँ निम्नलिखित हैं-
1. विखण्डन (Fission)—एककोशिकीय जीवों जैसे अमीबा, पैरामीशियम, जीवाणु आदि में विखण्डन से पहले DNA में द्विगुणन (replication) होता है। केन्द्रक दो भागों में बँट जाता है और इसके पश्चात् कोशिकाद्रव्य का दो भागों में बँटवारा हो जाता है। विखण्डन द्वारा निर्मित दोनों संतति कोशिकाएँ सभी लक्षणों में समान होती हैं। अनुकूल.ताप (207-30°C) व पर्याप्त भोजन उपलब्ध होने पर जीवाणु कोशिका 20 मिनट में विखण्डन द्वारा विभाजित होकर दो संतति कोशिकाओं का निर्माण कर देती है।
2. मुकुलन (Budding)-अनुकूल ताप व पर्याप्त भोजन उपलब्ध होने पर जनक जीव (यीस्ट, हाइड्रा, ओबेलिया आदि में) से मुकुलन द्वारा नए जीव की उत्पत्ति होती है। इसमें जनक शरीर पर एक उद्वर्ध (outgrowth) के रूप में मुकुल (bud) बनता है। कुछ समय पश्चात् मुकुल वृद्धि करके जनक से पृथक् हो जाता है और स्वतन्त्र जीवधारी का निर्माण करता है। यीस्ट में मुकुलन द्वारा अलैंगिक जनन एक सामान्य प्रक्रिया है। हाइड्रा (Hydra) के जठर क्षेत्रं पर मुकुल (bud) बनता है। यह 2 से 4 दिन में विकसित होकर जनक हाइड्रा से पृथक् होकर स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करने लगता है।
3. खण्डन (Fragmentation)-~-अनुकूल परिस्थितियों में विभिन्न कारणों से शैवाल, कवक आदि के तन्तु या हाइफा दो या अधिक भागों में टूट जाते हैं। प्रत्येक खण्ड (भाग) वृद्धि करके संतति पादप में विकसित हो जाता है, जैसे-यूलोथ्रिक्स (Ulothrix), स्पाइरोगाइरा (Spirogyra), जिग्नीमा (Zygnema), राइजोपस (Rhizopus) आदि में|
4. पुनरुद्भवन (Regeneration)-अनेक सरल संरचना वाले प्राणियों को छोटे-छोटे खण्डों (भागों) में काट देने पर प्रत्येक खण्ड या भाग वृद्धि करके अपने क्षतिग्रस्त भागों का पुनर्निर्माण कर लेता है। इस प्रक्रिया को पुनरुद्भवन (regeneration) कहते हैं। कुछ विकसित अकशेरुकी प्राणी अपने क्षतिग्रस्त भागों का पुनःनिर्माण कर लेते हैं, जैसे छिपकली में पूँछ का और तारा मछली में भुजा (arm) का पुनःनिर्माण हो जाता है। पुनरुद्भवन द्वारा सतात जीवों का निर्माण स्पज तथा निडेरियन (cnidarians) में होता है।
5. बीजाणुजनन (Sporulation)-जीवाणुओं, प्रोटोजोआ, शैवाल, कवक, ब्रायोफाइट्स टेरिडोफाइट्स में बीजाणुजनन एक सामान्य प्रक्रिया है। बीजाणु (spores) सूक्ष्म, एककोशिकीय संरचनाएँ होती हैं। इनका निर्माण बीजाणुंजनन (sporulation) कहलाता है। बीजाणु अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर नए जीव का निर्माण करते हैं। बीजाणुओं का प्रकीर्णन मुख्यतः जल एवं वायु द्वारा होता है। ये संरचना के आधार पर विभिन्न प्रकार के होते हैं, जैसे-
(i) चल बीजाणु (Zoospores)—ये कशाभिकाओं (flagella or cilia) की सहायता से जल के माध्यम से चलनशील होते हैं, जैसे-यूलोथ्रिक्स (Ulothrix), क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas), फाइटोप्थोरा (Phytophthora), ऐल्बूगो (Albugo) आदि में।
(ii) अचल बीजाणु (Aplanospores)-ये कशाभिकारहित बीजाणु या अचल (non-motile) बीजाणु होते हैं, जैसे---यूलोथ्रिक्स (Ulothrix), स्पाइरोगाइरा (Spirogyra), राइज़ोपस (Rhizopus), म्यूकर,(Mucor) आदि में।।
(iii) कोनीडिया (Conidia)—ये अचल बीजाणु होते हैं। ये कोनीडियाधानीधर (conidiophore) पर बनने वाले बहिर्जात (exogenous) बीजाणु होते हैं। ये अग्रिमवीं क्रम् (acropetal succession) अथवा आधारीय वर्धी क्रम (basipetal succession). में लगे रहते हैं, जैसे- पेनिसिलियम (Penicillium), पाइर्थियम (Pythium) आदि में।
(iv) क्लैमाइडोबीजाणु (Chlamydospores)-ये मोटी भित्ति वाले बीजाणु होते हैं। ये प्रतिकूल परिस्थितियों में बनते हैं। . अनुकूल वातावरण मिलने पर अंकुरित होकर नए पादप का निर्माण करते हैं, जैसे- राइजोपस (Rhizopus), म्यूकर (Mucor) आदि में।
