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BIOLOGY
नर जनन तन्त्र या पुरुष के जनन अंगों का स...

नर जनन तन्त्र या पुरुष के जनन अंगों का सचित्र वर्णन कीजिए।

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नर जनन अंग
(Male Reproductive Organs)
नर जनन अंगों को निम्नलिखित तीन समूहों में बाँट सकते हैं
I. मुख्य जनन अंग, II. सहायक जनन अंग, III. सहायक जनन ग्रन्थियाँ।
I. मुख्य जनन अंग (Main Reproductive organs)
ये अंग युग्मकों का निर्माण तथा लिंग हॉर्मोन्स का स्रावण करते हैं। - वृषण (Testis)-ये एक जोड़ी होते हैं तथा उदर गुहा से बाहर वृषण कोष (scrotal sac) में स्थित होते हैं। वृषण कोष एक पतली नलिका द्वारा उदर गुहा से जुड़े रहते हैं। इस नलिका को वंक्षण नलिका या इंग्वीनल नाल (inguinal canal) कहते हैं। वृषण नीचे की ओर लचीले तन्तुओं द्वारा वृषण कोष से जुड़े रहते हैं। इन तन्तुओं को गुबरनैकुलम (gubernaculum) कहते हैं। वंक्षण नलिका से स्पर्मेटिक रज्जु (spermaticcord) उदर गुहा में पहुँचती है। भ्रूणावस्था में वृषण उदर गुहा में स्थित होते हैं, जन्म से पूर्व वृषण इंग्वीनल नाल द्वारा वृषणं कोष में अवरोपित होते हैं। वृषण कोष का तापमान शरीर ताप से लगभग 2 से `2.5^@C` कम होता है। इसी कारण वृषण में शुक्रजनन द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण होता है।
वृषण लगभग 4-5 सेमी लम्बा, 2.5 सेमी चौड़ा व 3 सेमी मोटा होता है। प्रत्येक वृषण संयोजी ऊतक की एक पर्त से ढका. रहता है जिसे ट्यूनिका ऐल्ब्यूजीनियाँ (tunica albuginea) कहते हैं। वृषण अनेक कुण्डलित नलिकाओं के बने होते हैं जिन्हें शुक्रजनक नलिकाएँ (seminiferous tubules) कहते हैं जो संयोजी ऊतक में स्थित होती हैं। शुक्रजनक नलिकाओं में स्थित शुक्रजनन कोशिकाओं (spermatogenic cells) से शुक्रजनन द्वारा अगुणित शुक्राणुओं (sperms) का निर्माण होता है। शुक्रजनन नलिकाओं के मध्य स्थित सर्टोली कोशिकाएँ (cells of sertoli) शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करती हैं। शुक्रजनन नलिकाओं के मध्य संयोजी ऊतक में स्थित अन्तराली या लेडिग कोशिकाएँ (cells of leydig) टेस्टोस्टेरॉन (testosterone) हॉर्मोन्स का स्रावण करती हैं। ये द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के विकास से सम्बन्धित है। वृषण की सभी शुक्रजनन नलिकाएँ छोटी-छोटी नलिकाओं के जाल वृषण जालिका (rete testis) में खुलती हैं। वृषण जालिका से 15-20 पतली शुक्रवाहिकाएँ (vasa efferentia) निकलती हैं जो एपीडिडाइमिस में खुलती हैं।

II. सहायक जनन अंग (Accessory Reproductive organs)
निम्नलिखित अंग जनन की प्रक्रिया में सहायक होते हैं-
1. एपीडिडाइमिस (Epididymis)-एपीडिडाइमिस लगभग 6 मीटर लम्बी, पतली तथा अत्यधिक कुण्डलित नलिका होती है जो वृषण के अग्र, पश्च तथा भीतरी भाग को ढके रहती है। यह अति कुण्डलित होकर लगभग 4 सेमी लम्बी, चपटी, कॉमा के आकार की संरचना बनाती है। एपीडिडाइमिस में शुक्राणु संगृहीत एवं परिपक्व होते हैं।
एपीडिडाइमिस के तीन भाग होते हैं-शीर्ष एपीडिडाइमिस (caput epididymis), मध्य भाग या एपीडिडाइमिस काय (corpus epididymis) तथा पुच्छ एपीडिडाइमिस (cauda epididymis)। पुच्छ एपीडिडाइमिस से बाहर की ओर लचीले पेशीय तन्तु लगे रहते हैं, जो वृषण कोष की भीतरी भित्ति से जुड़े रहते हैं, इन्हें गुबरनैकुलम (gubernaculum) कहते हैं।
2. शुक्रवाहिनी (Vas deferens)-प्रत्येक एपीडिडाइमिस से एक शुक्रवाहिनी निकलकर वंक्षण नाल से होती हुई उदरगुहा में प्रवेश करती है और शुक्राशय की नलिका के साथ मिलकर स्खलन नलिका (ejaculatory duct) बनाती है। यह शुक्रवाहिनी मूत्रवाहिनी के साथ फंदा बनाकर मूत्रमार्ग के अधर भाग में खुलती है।
3. शुक्राशय (Seminal vesicle)—यह एक द्विपालित थैलीनुमा रचना है। इसकी भित्ति ग्रन्थिल होती है। इससे चिपचिपा द्रव स्रावित होता है, जो वीर्य का मुख्य भाग बनाता है। यह शुक्राणुओं का पोषण एवं संरक्षण करता है।
4. शिश्न (Penis)—यह बेलनाकार, हर्षण (erectile) नर मैथुन अंग है। यह उदरभित्ति से ढका वृषण कोषों के बीच स्थित रहता है। शिश्न के बीच में से होकर मूत्रमार्ग (urethra) गुजरता है, जो शिश्न के अग्र छोर पर मूत्रोजनन छिद्र द्वारा खुलता है। मूत्रमार्ग द्वारा शुक्राणु, शुक्राशय स्राव प्रोस्टेट तथा काउपर्स ग्रन्थि स्राव बाहर निकलते हैं।
III. सहायक जनन ग्रन्थियाँ (Accessory Reproductive Glands)
इन ग्रन्थियों का स्रावण जनन प्रक्रिया में सहायता करता है।
1. पुरःस्थ या प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate glands)—यह ग्रन्थि मूत्रमार्ग के अधर भाग के चारों ओर स्थित होती है तथा कई पिण्डों (lobules) की बनी होती है। इस ग्रन्थि से हल्का क्षारीय दूधिया तरल स्रावित होता है। यह वीर्य का लगभग 20-25% भाग बनाता है। यह मूत्रमार्ग की अम्लीयता को समाप्त करता है, जिससे शुक्राणु सक्रिय बने रहते हैं और स्त्रियों की फैलोपियन नलिकाओं में अण्डाणु के निषेचन की सम्भावना को बढ़ाता है।
2. काउपर्स ग्रन्थियाँ (Cowper.s Glands)- इन्हें बल्बोयूरेथ्रल ग्रन्थियाँ (bulbourethral glands) भी कहते हैं। ये ग्रन्थियाँ एक जोड़ी होती हैं तथा मूत्रमार्ग के पार्श्व में स्थित होती हैं। काउपर्स ग्रन्थियाँ मैथुन से पहले एक क्षारीय एवं चिकने द्रव का स्रावण करती हैं। यह मूत्रमार्ग की अम्लीयता को समाप्त करता है तथा इसका कुछ भाग योनि मार्ग में पहुँचकर स्नेहक की तरह कार्य करता है और मैथुन को सुगम करता है।
3. पेरीनियल ग्रन्थियाँ (Perineal Glands)-एक जोड़ी ग्रन्थियाँ मलाशय के पास स्थित होती हैं। ये ग्रन्थियाँ विशिष्ट रसायन स्रावित करती हैं, जो एक विशिष्ट गन्ध प्रदान करता है।
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