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BIOLOGY
मादा प्राइमेटो में होने वाले जनन चक्र को...

मादा प्राइमेटो में होने वाले जनन चक्र को क्या कहते है?

लिखित उत्तर

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मादा स्तनी के अण्डाशय में चक्रीय क्रम में परिवर्तन होते हैं। मानव मादा में ये परिवर्तन माह में एक बार दोहराए जाते हैं। अत: इसे माहवारी चक्र या आर्तव चक्र (menstrual cycle) कहते हैं। माहवारी चक्र का अन्त योनि द्वारा रुधिर प्रवाह से । होता है। इस रुधिर प्रवाह को माहवारी या ऋतुस्त्राव (menstruation) कहा जाता है। यह प्रक्रिया सामान्यत: 28 दिनों के अन्तराल पर होती है। ऋतुस्त्राव में अपखण्डित गभाशय, अन्तःस्तर (endometrium), श्लेष्मा, श्वेत रुधिराणु तथा आनाँचत अण्डाणु योनि से बाहर निकलते हैं।
माहवारी चक्र का नियन्त्रण
(Regulation of Menstrual Cycle)
माहवारी चक्र का नियन्त्रण अग्र पीयूष से स्रावित होने वाले हॉर्मोन करते हैं। पुंटिका प्रेरक हॉर्मोन (Follicle Stimulating Hormone : FSH),अण्डाशय में ग्राफियन पुटिका (Graafian follicle) के परिपक्वन को प्रेरित करता है। ल्यूटिनाइजिंग हॉर्मोन (Luteinizamg-Hormone : LH) अण्डोत्सर्ग तथा प्रोजेस्टेरॉन के स्रावण को प्रेरित करता है।
माहवारी चक्र की दो प्रावस्थाएँ होती हैं—पुटिका प्रावस्था या गुणन प्रावस्था (follicular phase or proliferative Dhase) तथा स्त्रावण प्रावस्था या ल्यूटियल प्रावस्था (secretory phase or luteal phase)। पुटिका प्रावस्था या गुणन प्रावस्था (Proliferative Phase)
यह चरण पीयष ग्रन्थि की अम्रपालि से स्रावित पटिका प्रेरक हॉर्मोन (folliclestimulating hormone) के प्रभाव में होता है। पुटिका प्रेरक हॉर्मोन के प्रभाव के कारण अण्डाशय में एक ग्राफियन पुटिका,परिपक्व होने लगती है। ग्राफियन पुटिका एस्ट्रोजन हॉर्मोन (estrogen hormone) का स्रावण करती है। पुटिका प्रावस्था 10 से 12 दिन की होती है।
इस प्रावस्था में गर्भाशय, फैलोपियन नलिका तथा योनि की भित्तियों में ऊतकों की वृद्धि होने लगती है। माहवारी के समय हुई भित्तियों की टूट-फूट की मरम्मत हो जाती है। एस्ट्रोजन के प्रभाव से गर्भाशय की एण्डोमेट्रियम (endometrium) मोटी हो जाती है, गर्भाशय ग्रन्थियों में वृद्धि होने लगती है। गर्भाशय की भित्ति में संकुचन होने लगता है तथा फैलोपियनं नलिकाओं के पक्ष्माभ (cilia) सक्रिय गति करने लगते हैं।
ये सब गतियाँ शुक्राणु को अण्डाणु के पास पहुँचाने में सहायक होती हैं।
एस्ट्रोजन का स्त्रावण बढ़ने से का स्रावण कम हो जाता है। अब ल्यूटिनाइजिंग हॉर्मोन (LH) का स्रावण धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। अण्डोत्सर्ग या डिम्बोत्सर्ग (Ovulation).
ल्यूटिनाइजिंग हॉर्मोन के प्रभाव से ग्राफियन पुटिका फट जाती है और अण्डाशय से.द्वितीयक अण्डाणु कोशिका (secondary oocyte) मुक्त हो जाती है। द्वितीयक अण्डाणु कोशिका का आकार लगभग 100 um होता है। यह अपीतकी (alecithal) होता है। अण्डोत्सर्ग 14वें दिन होता है।
स्रावण प्रावस्था या ल्यूटियल प्रावस्था (Secretory Phase or Luteal Phase)
यह चरण पीयूष ग्रन्थि की अग्र पालि से स्रावित ल्यूटिनाइजिंग हॉर्मोन के प्रभाव में होता है। यह प्रावस्था 12 से 14 दिन की होती है।
ग्राफियन पुटिका से द्वितीयक अण्डाणु कोशिका के मुक्त होने के पश्चात् शेष. पुटिका कोशिकाएँ तथा रक्त थक्का एक पीले रंग की अन्तःस्रावी रचना में बदल जाती हैं जिसे कॉर्पस ल्यूटियम (corpus luteum) कहते हैं। कॉर्पस ल्यूटियम से प्रोजेस्टेरॉन (progesterone) हॉर्मोन स्रावित होता है।
प्रोजेस्टेरॉन के प्रभाव से गर्भाशय की भित्ति सम्भावित गर्भावस्था के लिए तैयार होने लगती है। गर्भाशय की भित्ति अधिक मोटी हो जाती है। इसमें अधिक रुधिर वाहिनियाँ विकसित हो जाती हैं, गर्भाशय ग्रन्थियाँ सक्रिय होकर पोषक पदार्थ स्रावित करने लगती हैं। गर्भाशय की भित्तियों में कोई हलचल नहीं होती। ये सब परिवर्तन गर्भाशय की भित्ति में भ्रूण के रोपण (implantation) में सहायक होते हैं। प्रोजेस्टेरॉन के प्रभाव से दूसरी ग्राफियन पुटिकाओं का परिपक्वन रुक जाता है। प्रोजेस्टेरॉन के बढ़ते स्तर के कारण LH का स्रावण कम होने लगता है।
यदि अण्डाणु का निषेचनं हो जाता है और वह गर्भाशय की भित्ति में रोपित हो जाता है, तब कॉर्पस ल्यूटियम बना रहता है तथा प्रोजेस्टेरॉन का स्रावण होता रहता है। यह अवस्था गर्भावस्था कहलाती है।
रुधिर प्रवाह (Flow of blood)
यदि अण्डाणु का निषेचन नहीं होता,, तब कॉर्पस ल्यूटियम नष्ट हो जाती है जिससे प्रोजेस्टेरॉन तथा एस्ट्रोजन दोनों का ही स्रावण एकदम बन्द हो जाता है। इन दोनों हॉर्मोन्स की अनुपस्थिति में गर्भाशय की मोटी एण्डोमेट्रियम टूट जाती है तथा बढ़ी हुई रुधिर वाहिनियाँ भी नष्ट हो जाती हैं। रुधिर के साथ ऊतकों के टुकड़े रुधिर प्रवाह के.साथ योनि मार्ग द्वारा बाहर निकलते हैं। इस रुधिर प्रवाह को ही माहवारी या ऋतुस्त्राव (menstruation) कहते हैं। यह प्रावस्था 28वें दिन प्रारम्भ होकर सामान्यतः 4 से 6 दिन तक चलती रहती है।

यह प्रक्रिया प्रति माह दोहराई. जाती, रहती है। गर्भावस्था में माहवारी (menstruation) नहीं होती।
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