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BIOLOGY
भारत के भूकम्प जोखिम क्षेत्रों के विषय म...

भारत के भूकम्प जोखिम क्षेत्रों के विषय में बताइए।

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ग्रेगर जोहन मेण्डल (Gregor Johann Mendel) का जन्म ऑस्ट्रिया (Austria) के बुन (Brunn) शहर में 22 जुलाई 1822 में हुआ थाI
मेण्डल के प्रयोग (Experiments of Mendel)
मेण्डल ने 8 वर्षों (1856-63) तक सामान्य मटर पाइसम सैटाइवम (Pisum sativum) पर प्रयोग किए। इन प्रयोगों के परिणाम सन् 1865 में .प्रोसीडिंग्स ऑफ नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ऑफ ब्रन. (Proceedings of Natural History Society of Brunn) में पौधों में संकरण के प्रयोग. (Experiments in Plant Hybridization) शीर्षक से प्रकाशित हुए। लेकिन लगभग 35 वर्षों तक किसी ने मेण्डल के कार्य को महत्त्व नहीं दिया। 1900 में ह्यूगो डी वीज (Hugo de Vries), वॉन शैरमाक (Von Tschermak) तथा कार्ल कोरेन्स (Carl Correns) ने स्वतन्त्र रूप से अलग-अलग कार्य करके वही निष्कर्ष निकाले जो मेण्डल ने प्रस्तुत किए थे। इसके पश्चात् सभी ने मेण्डल के नियमों को स्वीकार किया। मेण्डल को आनुवंशिकी का जनक (father of genetics) कहा जाता है।
प्रयोगों हेतु मटर का पौधा चुनने के कारण
(Reasons for Selecting Pea Plant for Experiments)
मेण्डल द्वारा मटर के पौधे को अपने प्रयोगों के लिए चुनने के निम्नलिखित कारण थे-
(1) मटर के पौधे में अनेक परस्पर विरोधी अथवा विकल्पी लक्षण उपस्थित थे, जैसे-हरे एवं पीले रंग के बीज, बैंगनी तथा सफेद पुष्प वाले पौधे, लम्बे तथा नाटे तने वाले पौधे आदि।
(2) मटर के पौधे में सामान्यत: स्वपरागण (self-pollination) होता है, लेकिन इसमें परपरागण (cross pollination) भी आसानी से कराया जा सकता है।
(3) मटर का पौधा एकवर्षीय होता है। अत: अनेक पीढ़ियों का अध्ययन सुगमता से किया जा सकता है।
(4) संकर (hybrid) पीढ़ी जननक्षम (fertile) होती है।
(5) मेण्डल ने अपने प्रयोगों के लिए सात तुलनात्मक लक्षण चुने थे-बीज कवच का रंग, पौधे के तने की लम्बाई, बीज कवच का आकार, पुष्प का रंग, फली का आकार, पुष्प की तने पर स्थिति तथा बीजपत्र का रंग। मेण्डल भाग्यशाली रहे, क्योंकि उन्होंने जिन सात तुलनात्मक लक्षणों का चयन किया, वे अलग-अलग गुणसूत्रों पर स्थित थे।
प्रयोग की क्रियाविधि
(Methodology of Experiment)
सर्वप्रथम मेण्डल ने अनेक पीढ़ियों तक स्वपरागण द्वारा पौधों को लक्षणों के लिए शुद्ध बनाया। शुद्ध पौधों का प्रयोग जनक पीढ़ी के रूप में किया। संकरण (hybridization) के अन्तर्गत तुलनात्मक विरोधी लक्षणों को ध्यान में रखकर शुद्ध जनक पौधों में परपरागण कराया। इसके फलस्वरूप उत्पन्न पौधों को संकर पौधे (hybrid plants) कहते हैं। इस पीढ़ी को प्रथम पुत्रीय पीढ़ी (first filial or `F_(1)` generation) कहा। प्रथम पुत्रीय पीढ़ी के संकर पौधों में स्वपरागण कराया, इसके फलस्वरूप उत्पन्न पौधों को द्वितीय पुत्रीय पीढ़ी (`F_(2)` generation) कहा। मेण्डल ने प्रत्येक पीढ़ी में उत्पन्न पौधों की संख्या तथा सारे परिणामों को सावधानीपूर्वक नोट किया। इसके पश्चात् ये प्रयोग उलट कर (reciprocal cross) किए अर्थात् यदि पहले प्रयोग में लम्बे तने वाले पौधे के अण्डाणु प्रयुक्त किए थे तो अगली बार उसी प्रयोग में लम्बे तने वाले पौधे के परागकण प्रयुक्त किए। सभी सात लक्षणों को ध्यान में रखकर अलग-अलग तथा दो या अधिक लक्षणों का एकसाथ अध्ययन किया गया तथा प्रयोगों को अनेक बार दोहराया गया।

इसके पश्चात् मेण्डल ने अपने प्रयोगों के परिणामों की गणना तथा विश्लेषण सांख्यिकी के आधार पर की। इस प्रकार मेण्डल ने मटर के पौधे पर सफलतापूर्वक प्रयोग करके तथा उनके परिणामों का विश्लेषण करके आधुनिक आनुवंशिकी (modern genetics) की नींव रखी।
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