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BIOLOGY
मेण्डल के प्रभाविता नियम को लिखिए।...

मेण्डल के प्रभाविता नियम को लिखिए।

लिखित उत्तर

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आनुवंशिकी का वैज्ञानिक अध्ययन सर्वप्रथम मेण्डल (Mendel, 1865) ने किया था। मेण्डल के नियमों की पुष्टि 1900 में ह्यूगो डी वीज (Hugo de Vries), एरिक वॉन शेरमाक (Erick Von Tschermak) तथा कार्ल कोरेन्स (Carl Correns) ने की थी।
एक गुण वंशागति पर आधारित प्रयोग
(Experiments based on Single Trait Inheritance)
मेण्डल द्वारा एक लक्षण को ध्यान में रखकर किए गए प्रयोग को एकसंकर क्रॉस (monohybrid cross) कहते हैं। जनक (P) पीढ़ी के शुद्ध लम्बे तने वाले पौधे तथा शुद्ध बौने तने वाले पौधे के बीच संकरण कराने पर `F_(1)` पीढ़ी में सभी पौधे लम्बे तने वाले प्राप्त होते हैं। `F_(1)` पीढ़ी के लम्बे तने वाले पौधों के मध्य स्वपरागण कराने पर `F_(2)` पीढ़ी में लम्बे तथा बौने पौधे 3 : 1 के अनुपात में प्राप्त होते हैं। इसे फीनोटिपिकं अनुपात (phenotypic ratio) कहते हैं। `F_(2)` पीढ़ी के पौधों का जीन संरचना के आधार पर जीनोटिपिक अनुपात 1 : 2 : 1 होता है।

फीनोटिपिक अनुपात - 3 लम्बे : 1 बौना पौधा
जीनोटिपिक अनुपात - 1 लम्बा शुद्ध : 2 लम्बे संकर : 1 शुद्ध बौना पौधा
इन परिणामों से स्पष्ट है कि बौनेपन का लक्षण जो `F_(1)` पीढ़ी में प्रकट नहीं हुआ था वह लम्बेपन के साथ मिश्रित नहीं हुआ था, अपितु बौनेपन का लक्षण अप्रभावी (recessive) होने के कारण `F_(1)` पीढ़ी में छिपा रहता है। युग्मक निर्माण के समय कारकों (जीन्स) का विसंयोजन होने के कारण `F_(2)` पीढ़ी के कुछ पौधों में बौनेपन का लक्षण फिर शुद्ध अवस्था में आ जाने के कारण प्रकट हो जाता है।
एकसंकर क्रॉस के आधार पर मेण्डल ने निम्नलिखित नियम प्रस्तुत किए-
(i) प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)-जब विरोधी या तुलनात्मक लक्षणों वाले दो पौधों के बीच संकरण कराया जाता है तब जो लक्षण पहली पीढ़ी में प्रकट होता है, उसे प्रभावी लक्षण (dominant trait) कहते हैं और जो लक्षण प्रदर्शित नहीं होता, अप्रभावी लक्षण (recessive trait) कहते हैं। प्रभावी जीन के प्रभाव का प्रभाविता (dominance) तथा अप्रभावी जीन को. जो स्वयं को `F_(1)` पीढ़ी में प्रदर्शित नहीं कर पाता अप्रभाविता (resessive) से प्रदर्शित करते हैं। प्रभावी जीन (कारक) को capital letter से तथा अप्रभावी जीन (कारक) को small letter से दर्शाते हैं। जैसे लम्बे पौधों को ..T" तथा बौने पौधों को .t. से दर्शाते हैं।
(ii) पृथक्करण का नियम या विसंयोजन का नियम या युगमकों की शुद्धता का नियम (Law of Segregation or Law of Purity of Gametes)-दो विरोधी या तुलनात्मक लक्षणों के शुद्ध पौधों में परपरागण के फलस्वरूप बने `F_(1)` पीढ़ी के संकर पौधों में युग्मकों के निर्माण के समय दोनों विरोधी (तुलनात्मक) लक्षण के जीन्स पृथक् होकर अलग-अलग युग्मक में जाते हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक युग्मक एक लक्षण विशेष के लिए हमेशा शुद्ध होता है। इसे पृथक्करण या युग्मकों की शुद्धता का नियम कहते हैं।
मेण्डल ने अपने प्रयोगों के आधार पर अनुमान लगाया कि पौधों के विपरीत लक्षणं जैसे तने का लम्बापन व बौनापन, बीज चोल का पीला व हरा रंग आदि युग्मक कोशिकाओं के जीवद्रव्य में किसी-न-किसी रूप में अवश्य पाए जाते हैं। मेण्डल ने इन्हें कारक (factor) कहा और बताया कि जीव में पाए जाने वाले प्रत्येक लक्षण के लिए.एक कारक उत्तरदायी होता है। इन्हीं कारकों के कारण आनुवंशिक लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशागत होते हैं। मेण्डल के कारक. को ही जीन (gene) कहा जाता है।
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