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BIOLOGY
मानव में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीनों तथा...

मानव में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीनों तथा वसाओं का पाचन किस प्रकार होता है?

लिखित उत्तर

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मनुष्य में भोजन का पाचन
भोज्य पदार्थों का पाचन दो प्रकार से होता है- (i) यान्त्रिक या भौतिक पाचन तथा (ii) रासायमिक पाचन।
(i) यान्त्रिक पाचन -मुखगुहा में भोजन को चबाना, आमाशय में भोजन की लुगदी बनना, आहार नाल की पेशियों में क्रमाकुंचन गतियाँ आदि यान्त्रिक पाचन या भौतिक पाचन कहलाता है।
(ii) रासायनिक पाचन -पाचक एन्जाइम जटिल, अघुलनशील भोज्य पदार्थों पर रासायनिक क्रिया करके उन्हें सरल घुलनशील इकाइयों में बदल देते हैं।
मुखगुहा में पाचन
मुखगुहा में भोजन का यान्त्रिक तथा रासायनिक पाचन होता है। यान्त्रिक पाचन के कारण भोजन में लार मिल जाती है, जिससे भोजन को सुगमता से निगला जा सकता है। लार में उपस्थित टायलिन एन्जाइम के कारण भोजन का लगभग 30% मण्ड माल्टोज में बदल जाता है। लार में उपस्थित लाइसोजाइम भोजन में उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट करता है। लार का pH मान लगभग 6.8 होता है।
`"मण्ड+ जल "underset("pH 6.8") overset("टायलिन")to "माल्टोज"`
आमाशय में भोजन का पाचन
भोजन ग्रासनाल से होकर आमाशय में पहुँचता है। आमाशय में पेशीय गति के कारण भोजन की लुगदी बन जाती है। आमाशय की भित्ति में उपस्थित जठर ग्रन्थियाँ जठर रस का स्रावण करती हैं। जठर रस में 97% से 99% जल होता है। इसके अतिरिक्त श्लेष्म, 0.2% से 0.5% हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCI), पेप्सिन, जठर लाइपेज तथा रेनिन आदि एन्जाइम होते हैं। वयस्क मनुष्य में रेनिन का अभाव होता है।
जठर रस अम्लीय होता है इसका pH मान 1 से 3.5 तक होता है।
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) निष्क्रिय पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलता है, भोजन में उपस्थित जीवाणुओं को मारता है, भोजन को सड़ने से रोकता अस्थियों को घुलाता है।
(i) पेप्सिन -यह प्रोटीन को प्रोटिओजेज तथा पेप्टोन्स में बदलता है।
`"पेप्सिन पेप्सिन "to "प्रोटिओजेज +पेप्टोन्स"`
(ii) जठर लाइपेज -आमाशय में वसाओं का पाचन बहुत कम होता है।
` " वसा " ("जठर लाइपेज")/(pH 2) "वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल"`
(ii) रेनिन -यह प्रोरेनिन के रूप में स्रावित होता है। प्रोरेनिन HCl की उपस्थिति में सक्रिय रेनिन में बदल जाता है। रेनिन दूध की केसीन प्रोटीन को अघुलनशील कैल्सियम पैराकेसीनेट में बदल देता है जिससे दूध दही के रूप में बदल जाता है।
छोटी आंत्र में पाचन
पाचन मुख्यतः छोटी आंत्र के ग्रहणी भाग में होता है। ग्रहणी में पित्ताशय से पित्त रस तथा अग्न्याशय से अग्न्याशयी रस आते हैं। छोटी आंत्र में स्थित लिबरकुहन की दरारें आंत्रीय रस स्त्रावित करती हैं।
(i) पित्त रस -इसके लवण भोजन की वसा का इमल्सीकरण करते हैं। क्षारीय पित्त रस काइम को क्षारीय बनाता है इसे काइल कहते है। आंत्र को क्रमाकुंचन गतियों को बढ़ाता है। पित्त लवण कोलेस्टेरॉल को घुलनशील बनाए रखते हैं। पित्त रस पित्त वर्णको तथा कोलेस्टेरॉल को मल के साथ शरीर से बाहर निकालते हैं।
(ii) अग्न्याशयी रस -यह पूर्ण पाचक रस होता है। क्षारीय अग्न्याशयी रस का pH मान 7.5 से 8.3 होता है।
(a) प्रोटीन पाचक एन्जाइम ट्रिप्सिन -इसका स्रावण निष्क्रिय ट्रिप्सिनोजन तथा काइमोट्रिप्सिन के रूप में होता है। यह आंनीय, एण्टेरोकाइनेज की उपस्थिति में सक्रिय ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रिप्सिन में बदल जाता है। ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रिप्सिन में `"प्रोटीन " underset("pH 7.8") overset("ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रोपीन")to " पेप्टोन्स+ पॉलिपेप्टाइड्स"`
(b) कार्बोहाइड्रेट पाचक एन्जाइम -आग्न्याशयो रस में अग्न्याशयी एमाइलेज होता है। यह पॉलीसैकेराइड्स को, डाइसैकेराइड्स में बदलता है।
`"स्टार्च + जल " ("एमाइलेज")/(pH 7.8) "माल्टोज़"`
(c) वसा पाचक एन्जाइम -अग्न्याशयी रस में अग्न्याशयी लाइपेज या स्टीएप्सिन एन्जाइम होता है। यह एन्जाइम इमल्सीकृत वसा का पाचन करता है।
`"इमल्सीकृत वसा " underset("pH 7.8") overset("लाइपेज")to "वसीय अम्ल + ग्लिसरॉल"`
(d) न्यूक्लिएजेज -ये न्यूक्लिक अम्लों को न्यूक्लियोटाइड्स में तोड़ते हैं-
डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिएज -यह DNA का पाचन करता है।
`"DNA "underset(pH 7.8) overset("डिऑक्सोराइबोन्यूक्लिएज")to " न्यूक्लियोटाइड्स"`
बदल जाता है
(iii) आंत्रीय रस -क्षुद्रांत्र की प्रन्थियों से क्षारीय आंत्रीय रस सावित होता है। इसका pH मान 7.5 से 8.3 तक होता है। आंत्रीय रस के पाचक एन्जाइम निम्नलिखित कार्य करते हैं-
(a) प्रोटीन पाचक एन्जाइम्स -इन्हें सामूहिक रूप से इरेप्सिन कहते हैं। ये पॉलीपेप्टाइड्स को ऐमीनो अम्लों में तोड़ देते हैं। इस प्रकार, इनके द्वारा प्रोटीन का पाचन पूर्ण होता है।
(b) कार्बोहाइड्रेट पाचक एन्जाइम्स -इसके अन्तर्गत आने वाले माल्टेज, लैक्टेज तथा सुक्रेज एन्जाइम डाइसैकेराइड्स को मोनोसैकेराइड्स (ग्लूकोज, फ्रक्टोज, गैलेक्टोज आदि) में बदल देते हैं।
(c) वसा पाचक एन्जाइम्स -आंत्रीय रंस में उपस्थित लाइपेज शेष वसा को वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में बदल देता है।
(d) न्यूक्लियोटाइड्स का पाचन -न्यूक्लियोटाइड्स के पाचन से क्षारक एवं शर्कराएँ आदि बनती हैं।
क्षुद्रात्र में भोजन के पाचन तथा अवशोषण की क्रिया पूर्ण होती है। क्षुद्रांत्र की भीतरी सतह पर रसांकुर (villi) में रक्त तथा लसीका केशिकाएँ पाई जाती हैं। लसीका केशिकाएँ वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल का अवशोषण करती हैं। शेष पचे हुए भोज्य पदार्थो, जैसे-ऐमीनो अम्ल, शर्कराएँ, विटामिन्स, लवण, जल, नाइट्रोजन क्षारक आदि का अवशोषण रक्त केशिकाएँ करती हैं। पचा हुआ भोजन रक्त द्वारा केशिकाओं में पहुँचकर जीवद्रव्य में आत्मसात हो जाता है, इस क्रिया को स्वांगीकरण कहते हैं। अपचित भोज्य पदार्थों को मल के रूप में बहिःक्षेपित कर दिया जाता है।
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