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PHYSICS - GS
नाभिकीय बंधन ऊर्जा#!# प्रति न्यूक्लियॉन ...

नाभिकीय बंधन ऊर्जा#!# प्रति न्यूक्लियॉन बंधन ऊर्जा#!#नाभिकीय बल #!#नाभिक का स्थायित्व#!# रेडियोऐक्टिवता#!#बैकेरल किरणों की प्रकृति

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नाभिक परिचय नाभिकीय बल बंधन ऊर्जा क्यू मान

नाभिक-परिचय|नाभिकीय बल|द्रव्यमान क्षति|बंधन ऊर्जा तथा बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लिऑन|रेडियो सक्रियता|रेडियोएक्टिविटी क्षय का नियम|नाभिकीय विखंडण तथा नाभिकीय संलयन|नाभिकीय रिएक्टर

नाभिक की स्थिरता नाभिकीय बल डेल्टा क्षय बीटा क्षय लैम्ब्डा क्षय

चिरसम्मत भौतिकी|क्वांटम भौतिकी|प्रकृति में मूल बल|गुरुत्वाकर्षण बल|वैद्युतचुंबकीय बल|प्रबल नाभिकीय बल|दुर्बल नाभिकीय बल|प्रौद्योगिकी एवं समाज में भौतिकी का योगदान|भौतिक विज्ञान तथा समाज का सम्बन्ध|वैज्ञानिक और उसके आविष्कार

परिरक्षण प्रभाव (σ) एवं प्रभावी नाभिकीय आवेश (Zeff)|परिरक्षण नियतांक (σ) को ज्ञात करने के लिए स्लेटर का नियम |परमाण्वीय त्रिज्या |परमाण्वीय आकार को प्रभावित करने वाले कारक |आयनन ऊर्जा |आयनन विभव को प्रभावित करने वाले कारक |आयनन ऊर्जा की तुलना |आयनन ऊर्जा के अनुप्रयोग |इलेक्ट्रॉन बंधुता |विद्युत ऋणात्मकता |OMR|सारांश

परमाणु त्रिज्या |आवर्त सारणी |परमाणु आकार मे आवर्तीय विचलन (Variation) - एक आवर्त मे |एक वर्ग मे |संक्रमण संकुचन |आयनन विभव या आयनन ऊर्जा |आयनन विभव को प्रभावित करने वाले कारक - प्रभावी नाभिकीय आवेश (Zeff)|अर्धपूरित एवं पूर्ण पूरित कक्षकों का स्थायित्व |Summary

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता जनसंख्या वृद्धि रोकना है। इस क्षेत्र में हमारे सभी प्रयत्न निष्फल रहे हैं। ऐसा क्यों है? यह इसलिए भी हो सकता है कि समस्या को देखने का हर एक का एक अलग नजरिया है। जनसंख्याशास्त्रियों के लिए यह आंकड़ों का अम्बार है। अफसरशाही के लिए यह टार्गेट तय करने की कवायद है। राजनीतिज्ञ इस वोट बैंक की दृष्टि से देखता है। ये सबस अपने-अपने ढंग से समस्या को सुलझाने में लगे हैं। अतः अलग-अलग किसी के हाथ सफलता नहीं लगी। पर यह स्पष्ट है कि परिवार के आकार पर आर्थिक विकास और शिक्षा का बहुत प्रभाव पड़ता है। यहाँ आर्थिक विकास का मतलब पाश्चात्य मतानुसार भौतिकवाद नहीं जहाँ बच्चों को बोझ माना जाता है। हमारे लिए तो यह सम्मानपूर्वक जीने के स्तर से सम्बन्धित है। यह मौजूदा सम्पति के समतामलक विवरण पर ही निर्भर नहीं है वरन् ऐसी शैली अपनाने से सम्बन्धित है जिसमें अस्सी करोड़ लोगों की ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल हो सके। इसी प्रकार स्त्री शिक्षा भी है। यह समाज में एक नए प्रकार का चिन्तन पैदा करेगी जिससे सामाजिक और आर्थिक विकास के नए आयाम खुलेंगे और साथ ही बच्चों के विकास का नया रास्ता भी खुलेगा। अतः जनसंख्या की समस्या सामाजिक है। यह अकेले सरकार नहीं सुलझा सकती। केन्द्रीयकरण से हटकर इसे ग्राम-ग्राम, व्यक्ति-व्यक्ति तक पहुँचना होगा। जब तक यह जन आन्दोलन नहीं बन जाता तब तक सफलता मिलना संदिग्ध है। जनसंख्या समस्या के प्रति हमारे दृष्टिकोण में जिस परिवर्तन की आवश्यकता है वह है

पर्यावरण प्रदूषण आज विश्वव्यापी समस्या है। वर्तमान एवं आने वाले दशकों में पृथ्वी की सम्पदा पर अधिक दबाव होगा। इस समस्या का मूल कारण है जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि, प्रदूषण एवं उपलब्ध साधनों का अधिकतम प्रयोग। सहस्राब्दियों तक मनुष्य ने प्राकृतिक साधनों के साथ अपनी संगति को कायम रखा है। मानवीय सभ्यता और प्राकृतिक वैभव की युगल-बन्दी चलती रही। मनुष्य तो प्रकृति का आराधक था। प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य का उसने सुख लिया, उसके छलछलाते स्नेह से अपने को आप्लावित किया और उसके सुर से सुर मिलाकर जीवन के संगीत की रचना की, परन्तु आश्चर्य है कि आज मनुष्य अपनी लालसा, गुणात्मक जीवन और भौतिक सुख-सुविधा के लिए प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन व्यवस्थित रूप से नहीं करते हुए संरक्षण करने के बदले प्रकृति का निजी स्वार्थ हेतु विध्वन्स करने में लग गया है। आज विनाश की जो पटकथा लिखी जा रही है, उसके पीछे लालच, लूट-खसोट और लिप्सा की दृष्टि उत्तरदायी है। आज गुमराह इन्सान प्रकृति के पाँचों तत्त्वों से छेड़खानी कर रहा है। प्रकृति न तो पाषाणी है और न मूकदर्शिनी। उसे बदला लेना आता है। प्रकृति की त्यौरियाँ और तेवर बता रहे हैं कि वह बदला लेने पर आमादा है। दोनों तरफ मोर्चे खुल चुके हैं जाने कब क्या हो जाए। वन-विनाश, अन्धाधुन्ध प्रदूषण, संसाधनों का अनर्गल शोषण, नाभिकीय अस्त्रों की मूर्खतापूर्ण अन्धी दौड़ और औद्योगिक या प्रौद्योगिक उन्नति के नाम पर प्रकृति से अधिक छेड़छाड़ एवं हवा, पानी और मिट्टी जैसे प्राकृतिक साधनों के दुरुपयोग ने मनुष्य जाति को ही नहीं, सम्पूर्ण जीव-जड़ को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है। प्रस्तुत गद्यांश में प्रकृति के कितने तत्त्वों से छेड़खानी की बात की गई है?