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BIOLOGY
एक पारिस्थितिक तन्त्र में ऊर्जा प्रवाह क...

एक पारिस्थितिक तन्त्र में ऊर्जा प्रवाह का वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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पारिस्थितिक तन्त्र में ऊर्जा प्रवाह
(Flow of Energy in Ecosystem)

पारितन्त्र में ऊर्जा का प्रवाह ऊष्मागतिकी के नियमों का पालन करता है। इसकी दो प्रमुख स्थिति हैं- सूर्य की विकिरण ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तन (रूपान्तरण) तथा ऊर्जा का प्रवाह। ऊर्जा प्रवाह सूर्य से उत्पादक व उत्पादक से उच्चतम उपभोक्ता तक एकदिशीय (unidirectional) होता है।
हरे पौधों को सूर्य के प्रकाश की कुल आपतित ऊर्जा में से 50% ऊर्जा प्रकाश संश्लेषणीय सक्रिय विकिरण (PAR) के रूप में प्राप्त होती है। इनमें से उत्पादक 2-10 प्रतिशत ऊर्जा को प्रकाश संश्लेषण के रूप में स्थिर करते हैं। पारितन्त्र के सभी जीव इसी रासायनिक ऊर्जा से अपनी ऊर्जा आवश्यकताएँ पूरी करते हैं। हरे पौधों (उत्पादकों) से ऊर्जा शाकाहारियों या प्रथम श्रेणी के उपभोक्ताओं को प्रथम श्रेणी के उपभोक्ताओं से द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ताओं (मांसाहारियों) को तथा उनसे तृतीय श्रेणी के उपभोक्ताओं को प्राप्त होती है। प्रत्येक ऊर्जा स्थानान्तरण में कुछ ऊर्जा की हानि ऊष्मा के रूप में होती है। प्रत्येक स्तर से केवल 10 प्रतिशत ऊर्जा हो अगले पोषण स्तर को प्राप्त होती है।
प्रत्येक खाद्य स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा का 90% जीवधारी की जैविक क्रियाओं में खर्च हो जाता है, केवल 10% संचित ऊर्जा ही अगले खाद्य स्तर को हस्तान्तरित होती है। हस्तान्तरण के समय भी कुछ ऊर्जा का ह्रास होता है। इस प्रकार एक खाद्य स्तर से दूसरे खाद्य स्तर में केवल 10% ऊर्जा हस्तान्तरित होती है।
उदाहरण- एक खांद्य श्रृंखला में यदि उत्पादक के पास 100% ऊर्जा है तो प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता (शाकाहारी) को केवल 10% ऊर्जा मिलेगी। उससे दूसरी श्रेणी के उपभोक्ता (मांसाहारी) को केवल 1% ऊर्जा मिलेगी। इसी प्रकार अगली श्रेणी के उपभोक्ता को 0.1% ऊर्जा मिलती है। इस प्रकार एक से दूसरी श्रेणी के जीव को केवल 10% ऊर्जा पिछली श्रेणी से प्राप्त हो सकती है। उपभोक्ता में सर्वाधिक ऊर्जा केवल शाकाहारियों को प्राप्य है।
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