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BIOLOGY
जीवाणु कोशिका की संरचना का वर्णन कीजिए।...

जीवाणु कोशिका की संरचना का वर्णन कीजिए।

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उत्सर्जन - शरीर में विभिन्न उपापचयी क्रियाओं (metabolic activities) के फलस्वरूप बने नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट एवं हानिकारक पदार्थों को शरीर के बाहर निकालने की क्रिया को उत्सर्जन कहते हैं। केंचुए में उत्सर्जन वृक्कक या उत्सर्गिका (nephridia) द्वारा होता है। इनमें पटीय वृक्कक (septal nephridia) प्रारूपिक होते हैं। अन्य दो प्रकार के वृक्कक ग्रसनीय वृक्कक (pharyngeal nephridia) तथा अध्यावरणी वृक्कक (integumentary nephridia) होते हैं।
पटीय वृक्कक -(Septal Nephridia) 15वें/16वें खण्ड के अन्तराखण्डीय पट (intersegmental septum) से प्रारम्भ होकर प्रत्येक पट की दोनों सतहों (surface) पर पटीय वृक्ककों की दो-दो अर्द्धचन्द्राकार पंक्तियाँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में इनकी संख्या 20-25 होती है। इस प्रकार प्रत्येक पट पर इनकी संख्या 80-100 होती है।
संरचना (Structure) -पटीय वृक्कक के निम्नलिखित चार प्रमुख भाग होते हैं -(i) वृक्कक मुखिका (Nephrostome).-मुखिका एक कीप सदृश (funnel shaped) पंक्ष्माभिकामय (ciliated) रचना होती है, जो देहगुहा में खुलती है। इसकी गुहा एक केन्द्रीय कोशिका (central cell) में उपस्थित अन्त:कोशिकीय अवकाश (intracellular space) के रूप में होती है। वृक्कक, मुखिका का निर्माण ऊपरी तथा निचले ओष्ठ से होता है। ऊपरी ओष्ठ (upper lip) 8-9 पक्ष्माभयुक्त कोशिकाओं से तथा निचलाओष्ठ (lower lip) 4-5 पक्ष्माभयुक्त कोशिकाओं का बना होता है।

(ii) ग्रीवा (Neck) वृक्कक मुखिका एक छोटी-सी सँकरी ग्रीवा (neck) में खुलती है। ग्रीवा दूसरी ओर वृक्कक काय.से जुड़ी होती है। (iii) वृक्कक काय (Body of Nephridium)-इसके दो भाग होते हैं- (a) सीधी पालि (Straight lobe), (b) व्यावर्तित लूप (Twisted loop)
सीधी पालि व्यावर्तित लूप से लम्बाई में लगभग आधी होती है। व्यावर्तित लूप रस्सी की भाँति परस्पर लिपटी हुई दो भुजाओं का बना होता है। व्यावर्तित लूप की एक भुजा सीधी पालि से जुड़ी होती है तथा दूसरी भुजा अन्तिम नलिका (terminal duct) से जुड़ी होती है। व्यावर्तित लूप में 9 से 13 ऐंठन होती हैं। ग्रीवा की नलिका वृक्कक काय में घुसकर अन्दर-ही-अन्दर कई बार घूमती है। यह नलिका. स्थान-स्थान पर पक्ष्माभिक (ciliated) होती है।
(iv) अन्तिम नलिका (Terminal Duct)-वृक्कक काय से ही जहाँ ग्रीवा जुड़ी होती है, अन्तिम नलिका निकलती है।
पटीय वृक्ककों का कार्य (Functions of Septal Nephridia) -पटीय वृक्कक देहगुहिका द्रव (coelomic fluid) तथा रुधिर से नाइट्रोजनी उत्सर्जी पदार्थों को तरल के रूप में पृथक करते हैं। इसे मूत्र (urine) कहते हैं इसमें प्रमुखतः जल तथा यूरिया (urea) होता है। पटीय वृक्कक आंत्रमुखी वृक्कक (enteronephric nephridia) होते हैं।
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