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BIOLOGY
मेढक के पाचन तन्त्र का संक्षिप्त सचित्र ...

मेढक के पाचन तन्त्र का संक्षिप्त सचित्र वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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मेढक का पाचन तन्त्र - मेढक की आहारनाल मुखगुहा (buccal cavity) से प्रारम्भ होकर अवस्कर छिद्र द्वारा शरीर से बाहर खुलती है। मुखगुहा निगल द्वार (gullet) द्वारा ग्रासनाल (oesophagus) में खुलती है। ग्रासनाल की भित्ति पेंशीय, ग्रन्थिल तथा वलित (folded) होती है। ग्रासनाल आमाशय में खुलती है।
आमाशय - यह एक थैली सदश नलिका होती है। इसमें भोजन का संग्रह तथा पाचन होता है। इसका चौडा भाग कार्डियक भाग (cardiac part) तथा पश्च पतला भाग पायलोरिक भाग (pyloric part) कहलाता है। आमाशय एक कपाट द्वारा ग्रहणी (duodenum) में खुलता है। इसे पायलोरिक कपाट कहते हैं। यह सदैव बन्द रहता है। भोजन के आगे बढ़ते समय खुल जाता है। आमाशय की भित्ति ग्रन्थिल, पेशीय एवं वलित होती है। आमाशय में अनेक अनुलम्ब वलन पाए जाते हैं। आमाशय की भित्ति में जठर ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं। जठर ग्रन्थियाँ से जठर रस (gastric juice) स्त्रावित होता है। आन्त्र (Intestine)-आमाशय के बाद आहारनाल का शेष भाग आन्त्र (intestine) कहलाता है। इसके निम्नलिखित दो प्रमुख भाग होते हैं -
(1) छोटी आन्त्र (Small Intestine)-यह दो भागों से बनी होती है। इसका प्रारम्भिक भाग ग्रहणी (duodenum) तथा पश्च भाग क्षुद्रान्त्र (ileum) कहलाता है। । 4-5 सेमी लम्बी ग्रहणी आमाशय के साथ .U. आकार बनाती है। सामान्य पित्तवाहिनी (common bile duct) ग्रहणी के प्रारम्भिक भाग में खुलती है। क्षुद्रान्त्र लगभग 20-25 सेमी लम्बी कुण्डलित नलिका होती है। क्षदान्त्र में भोजन का पाचन तथा अवशोषण होता हैं। (2) बड़ी आन्त्र (Large Intestine) क्षुद्रान्त्र बड़ी आन्त्र में खुलती है। बड़ी आन्त्र के दो भाग होते हैं-प्रारम्भिक भाग मलाशय तथा पश्च भाग अवस्कर वेश्म (cloacal chamber) कहलाता है। अवस्कर वेश्म आहारनाल का अन्तिम भाग है, इसमें मलाशय, अण्डवाहिनियाँ (मादा मेढक में) तथा मूत्रजनन वाहिनियाँ, (नर मेढक में) खुलती हैं। अवस्कर वेश्म के पृष्ठ तल पर एक पालित, झिल्लीदार थैली मूत्राशय (urinary bladder) में खुलती है। अवस्कर वेश्म अवस्कर छिद्र द्वारा शरीर से बाहर .खुलता है, इससे मल तथा मूत्र दोनों शरीर से बाहर निकलते हैं।
यकृत (Liver)-यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि होती है। यह कत्थई रंग या गहरे लाल रंग की ग्रन्थि हैं। यह हृदय के पीछे स्थित होता है। यह दो पिण्डों में बँटा होता है। बायाँ पिण्ड द्विपालित होता है, इस कारण यकृतं तीन पिण्डों से बना प्रतीत होता है। दाएँ तथा बाएँ पिण्डों के मध्य पित्ताशय (gall-bladder) स्थित होता है। यकृत पिण्ड अनेक पिण्डकों से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक पिण्डदा यकृत कोशिकाओं (hepatic cells) से बना होता है। यकृत कोशिकाओं में बना पित्त पतली-पतली पित्त केशिकाओं द्वारा यकृत वाहिनियों (hepatic duct) में पहुँचता है। यकृत वाहिनियाँ परस्पर मिलकर पित्त कों पित्ताशय में पहुँचाती हैं। पित्ताशय से पित्त सामान्य पित्तनलिका (common bile duct) द्वारा ग्रहणी में पहुँचता है।
अग्न्याशय (Pancreas)-यह हल्के पीले रंग की अनियमित आकार की ग्रन्थि होती है। यह ग्रहणी तथा आमाशय के मध्य स्थित होती है। यह अनेक पिण्डकों Mobiles) से बनी होती है। पिण्डकों की कोशिकाएँ घनाकार तथा ग्रन्थिल होती हैं। इनसे अग्न्याशयी रस (pancreatic juice) स्रावित होता है। अग्न्याशय रस सह पित्तं नलिका (common bile duct) द्वारा पित्त के साथ ग्रहणी में पहुँचता है। अग्न्याशय रस एक पूर्ण पाचक रस कहलाता है। अग्न्याशय के मध्य स्थान-स्थान पर लैंगरहैन्स की द्वीपिकाएँ (Islets of Langerhans) स्थित होती हैं। यह ग्रन्थि का अन्त:स्त्रावी भाग है। इनसे इन्सुलिन तथा ग्लूकैगॉन (insulin and glucegon) हॉर्मोन स्रावित होते हैं।
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