गुणसूत्र की संरचना - केन्द्रकद्रव्य में स्थित क्रोमैटिन जाल कोशिका विभाजन के समय सूत्राकार संरचनाओं का रूप ले लेता है। गुणसूत्र कोशिका विभाजन की मध्यावस्था के समय स्पष्ट दिखते हैं। किसी भी जाति विशेष के लिए गुणसूत्रों की संख्या एवं आकृति निश्चित होती है। इनकी खोज स्ट्रासबर्गर (Strasburger, 1875) ने की थी। वाल्डेयर (Waldeyer, 1888) ने इनको गुणसूत्र (chromosome) नाम दिया। ये क्षारीय रंजकों से स्टेन होते हैं। सटन-तथा बॉवेरी (1902) के अनुसार गुणसूत्र आनुवंशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचाते हैं। गुणसूत्र छड़ के आकार की धागेनुमा पतली, कुण्डलित संरचना है। इनकी लम्बाई `0.5mu - 30mu` तथा व्यास 0.2`mu`से `3mu` होती है। मक्का में गुणसूत्र की लम्बाई 12`mu` तक होती है। ट्राइटुरस (Triturus) के अण्डकमें गुणसूत्र की लम्बाई 350-800 `mu` तक होती है। गुणसूत्र बिन्दु (centromere) की ऐनाफेज प्रावस्था (anaphase stage) में स्थिति के अनुसार गुणसूत्र I, J, U तथा V आकार का होता है।
गुणसूत्र बिन्दु (centromere) गुणसूत्र को दो भुजाओं में विभक्त करता है। कुछ गुणसूत्र की लम्बी भुजा में द्वितीय संकीर्णन (secondary constriction) भी मिलता है। द्वितीयक संकीर्णन के कारण गुणसूत्र का पृथक् भाग सैटेलाइट (satellite) कहलाता है। जिन गुणसूत्रों में सैटेलाइट होता है, उन्हें सैट गुणसूत्र (SAT-chromosome) कहते हैं। मुणसूत्र पर सूक्ष्म .माला के दाने सदृश रचनाएँ पायी जाती हैं, इन्हें क्रोमोमियर्स पर जीन्स स्थित होते हैं।
गुणसूत्र की आकारिकी या संरचना -
कोशिका विभाजन की पश्चावस्था (anaphase) में गुणसूत्र के निम्नलिखित भाग दिखाई देते हैं-
1. क्रोमोनिमेटा (Chromonemeta)-प्रत्येक गुणसूत्र में दो समान लक्षणों वाली धागेनुमा संरचना होती है, इन्हें अर्द्धगुणसूत्र अथवा क्रोमैटिड (chromatid) कहते हैं। प्रत्येक क्रोमैटिड में अनेक बहुत पतले धागे समान क्रोमोनिमेटा (chromonemata) पाए जाते हैं। ये संघनित होकर क्रोमैंटिड (chromatid) बनाते हैं। क्रोमोनिमेटा परस्पर पराकुण्डलित होते हैं। ये कुण्डली पेरानीमिक अथवा प्लेक्टोनीमिक प्रकार की हो सकती हैं। 2. मैट्रिक्स (Matrix)-क्रोमोनिमेटा मैट्रिक्स में मिलते हैं। परासूक्ष्मदर्शी से देखने पर मैट्रिक्स दिखाई नहीं देता है। मैट्रिक्स - एक आवरण से घिरा होता है, जिसे पेलिकल (pelicle) कहते हैं। 3. गुणसूत्र बिन्दु (Centromere)-यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण भाग है। इसकी उपस्थिति से ही तर्क बनते हैं। इसकी उपस्थिति से गुणसूत्र को निश्चित आकार मिलता है। यह स्थान गुणसूत्र का प्राथमिक संकीर्णन (primary constriction) भी कहलाता है। गुणसूत्र पर गुणसूत्र बिन्दु अथवा सेन्ट्रोमियर अनुपस्थित होने पर गुणसूत्र एसेन्ट्रिक (acentric), दो होने पर डाइसेन्ट्रिक (dicentric) अथवा बहुत से होने पर,पॉलिसेन्ट्रिक (polycentric) कहलाता है। गुणसूत्रं के मध्य में सेन्ट्रोमियर होने पर गुणसूत्र मेटासेन्ट्रिक (metacentric) सेन्ट्रोमीयर के मध्य बिन्दु से कुछ दूर स्थित होने पर गुणसूत्र सबमेटासेन्ट्रिक (submetacentric), मध्य से एक ओर होने पर एक्रोसेन्ट्रिक (acrocentric) तथा एक सिरे पर होने से गुणसूत्र टीलोसेन्ट्रिक कहलाता है 4. क्रोमोमियर अथवा जीन्स (Chromomere)-गुणसूत्र पर उभरे हुए माला के दाने सदृश रचनाओं को क्रोमोमियर (chromomeres) कहते हैं। बेलिंग (Belling, 1928) के अनुसार ये जीन अथवा जीन्स के समूह हैं, परन्तु आधुनिक वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं। जोहनसन (1909) ने सर्वप्रथम जीन शब्द का प्रयोग किया। जीन, वंशागति की मूलभूत इकाई है, जो जैविक लक्षणों को निर्धारित करती है 5. द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction)--कुछ गुणसूत्रों में गुणसूत्र बिन्दु के अतिरिक्त द्वितीयक संकीर्णन मिलता है। 6.टीलोमियर (Telomere)-प्रत्येक क्रोमोसोम के विशिष्ट सिरों अथवा छोरों (ends) को टीलोमियर कहते हैं। ये क्रियात्मक भिन्नता एवं ध्रुवता प्रदर्शित करते हैं 7.सैटेलाइट (Satellite)-द्वितीयक संकीर्णन से आगे का गुणसूत्र का छोटा-सा गोलाकार भाग सैटेलाइट कहलाता है। इस प्रकार के गुणसूत्र को SAT गुणसूत्र (SAT-chromosome) कहते हैं।
गुणसूत्र का रासायनिक संघटन (Chemical Composition of Chromosomes) -
गुणसूत्र न्यूक्लियोप्रोटीन (nucleoproteins) के बने होते हैं। गुणसूत्र का वह भाग जो आनुवंशिक दृष्टि से निष्क्रिय होता है , जसमें विनिमय कम होता है तथा गहरा रंग लेता है, हेटरोक्रोमैटिन (heterochromatin) कहलाता है। गुणसूत्र का वह भाग जो अभिरंजन (staining) से हल्का रँगता है तथा आनुवंशिक दृष्टि से सक्रिय होता है यूक्रोमैटिन (euchromatin) कहलाता है। गुणसूत्र में निम्नलिखित प्रोटीन मिलती हैं- (i) हिस्टोन प्रोटीन-लगभग 11%, (ii) सरल प्रोटीन लगभग 14%, (iii) अम्लीय प्रोटीन-लगभग 65%, (iv) न्यूक्लिक अम्ल-DNA 10% तथा RNA 2-3%.
गुणसूत्र के कार्य (Functions of Chromosome)-
गुणसूत्र के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) गुणसूत्र पर स्थित जीन्स DNA से बने होते हैं। DNA आनुवंशिक होता हैं। अत: जीन्स वंशागति का भौतिक आधार कहलाते हैं। (2) गुणसत्र जीवों की विभिन्न रासायनिक एवं उपापचयी क्रियाओं का नियन्त्रण तथा नियमन करते हैं। (3) गुणूसत्रों की संरचना एवं संख्या में परिवर्तन से जीवों में विभिन्नताएँ उत्पन्न हो जाती हैं, विभिन्नताएँ जैव विकास का आधार होती हैं। (4) SAT-गुणसूत्र के न्यूक्लिओलर संगठन क्षेत्र से न्यूक्लिओलस (nucleolus) का निर्माण होता है।