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Class 12
CHEMISTRY
वात्या भट्ठी का चित्र उसके प्रमुख क्षेत्...

वात्या भट्ठी का चित्र उसके प्रमुख क्षेत्रों के नाम तथा ताप को दर्शाते हुए बनाइए।

लिखित उत्तर

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लोहे के प्रमुख अयस्क
लोहे के प्रमुख अयस्क निम्नलिखित है-
(I) ऑक्साइड अयस्क-(i) मैग्नेटाइट `Fe_3O_4`, (ii) हेमेटाइट `Fe_2O_3`
(iii) लिमोनाइट `Fe_2O_3.""3H_2O`
(II) कार्बोनेट अयस्क-सिडेरांइट `FeCO_3`
(III) सल्फाइड अयस्क-(i) आयरन पाइराइट `FeS_2` (ii) आर्सेनिक पाइराइट `FeAsS`
(iii) कैल्कोपाइराइट `CuFeS_2`
लोहे (आयरन) का निष्कर्षण
लोहे (आयरन) का निष्कर्षण ऑक्साइड अयस्कों से किया जाता है। हेमेंटाइट `(Fe_2O_3)`, मैग्नेटाइट `(Fe_3O_4)` और हाइड्रेटेड ऑक्साइड `(2Fe_2O_3.""3H_2O)` लोहे के मुख्य ऑक्साइड अयस्क हैं, जिनसे लोहे का निष्कर्षण किया जाता है। इन अयस्कों से पहले ढलवा लोहा प्राप्त किया जाता है। अत: लोहे के अयस्कों से ढलवा .लोहा निम्नलिखित पदों की सहायता से प्राप्त किया जाता है-
1. अयस्क का सान्द्रण-अयस्क का सान्द्रण निम्न दो विधियों के द्वारा किया जाता है-
(i) गुरुत्वीय पृथक्करण विधि-लोहे के अयस्कों में 20%-55% के बीच लोहा होता है, इसलिए इसका सान्द्रण करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। हल्की अशुद्धियाँ जैसे रेत, मिट्टी आदि गुरुत्वीय पृथक्करण विधि (gravity separation method) द्वारा पृथक् कर ली जाती हैं। अयस्क के महीन चूर्ण पर जल की धारा प्रवाहित करने से अशुद्धियाँ जल के साथ बह जाती हैं तथा लोहे का भारी अयस्क नीचे बैठ जाता है।
(ii) चुम्बकीय पृथक्करण विधि-इस विधि में मैग्नेटाइट अयस्क का सान्द्रण चुम्बकीय विधि द्वारा किया जाता है।
2. सान्द्रित अयस्क का निस्तापन अथवा भर्जन-अयस्क को छोटे-छोटे टुकड़ों में परिवर्तित करके, उसमें कोक मिलाया जाता है। फिर इस मिश्रण को कम गहरी भट्ठियों में तथा वायु की अधिकता में गर्म किया जाता है। इस प्रकार निस्तापन करने से अग्रलिखित परिवर्तन होते हैं-
(i) नमी भाप बनकर निकल जाती है।
`Fe_2O_3"."3H_2Ooverset"निस्तापन"rarrunderset"निर्जल फेरिक आक्साइड"(Fe_2O_3)+3H_2Ouarr`
(ii) गन्धक, फॉस्फोरस तथा आर्सेनिक क्रमश: `SO_2,P_4O_(10)" व "As_2O_3` में ऑक्सीकृत होकर वाष्पों के रूप में अलग हो में जाते हैं (भर्जन)।
(iii) कार्बोनेट अयस्क अपघटित होकर फेरस ऑक्साइड बनाता है, जो फेरिक ऑक्साइड में ऑक्सीकृत हो जाता है अतः गलनीय फेरस सिलिकेट `(FeSiO_3)` नहीं बनता है। `FeCO_3overset"निस्तापन"rarrFeO+CO_2uarr`
`4FeO+O_2overset"भर्जन"rarr2Fe_2O_3`
(iv) अयस्क सरन्ध्र (porous) हो जाता है जिससे इसका अपचयन सरलतापूर्वक हो जाता है।

वात्या में भट्टी प्रगलन—एक सामान्य वात्या भट्ठी को चित्र-6.5 के द्वारा प्रदर्शित किया गया है। ये चिमनी की भाँति लगभग 25 से 60 मीटर तक ऊँची तथा 12 से 14 मीटर व्यास की होती है। इस भट्ठी का बाहरी भाग इस्पात की चादरों का बना होता है जबकि भीतरी दीवारों में अग्निरोधक ईंटों की परत लगी होती है। वात्या भट्ठी, की संरचना में तीन भाग होते हैं-
1. हॉपर या थोट-वात्या भट्ठी के सबसे ऊपर वाले भाग को हॉपर कहते हैं। इसमें घान या चार्ज (charge) को भीतर भेजने के लिए कप-कोन की व्यवस्था (Cup-Cone arrangement) होती है। कप-कोन व्यवस्था के नीचे दोनों ओर व्यर्थ गैसों को निकालने के लिए एक निकास द्वार बना होता है।
बॉडी तथा बॉश—यह भाग दो शंकुओं (cones) से निर्मित होता है। ऊपर वाले लम्बे शंकु को बॉडी (body) तथा नीचे वाले छोटे शंकुओं को बॉश कहा जाता है। बॉडी तथा बॉश दोनों ही स्टील की प्लेटों से बने होते हैं, जिनके भीतरी तरफ अग्निरोधक ईंटों का अस्तर लगा होता है। इसमें ऊपर से नीचे तक ताप लगातार बढ़कर लगभग `1600^@C` हो जाता है। बाँश के निचले भाग में दो ट्वीयर (tuyers) लगे होते हैं, जिनके द्वारा गर्म हवा भट्ठी के भीतर भेजी जाती है। इस भाग में चार्ज भिन्न-भिन्न तापक्रमों के सम्पर्क में आता है जिससे विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाएँ होती हैं।
3. चूल्हा-भट्ठी के सबसे निचले भाग में एक चूल्हा होता है। इसमें संगलित धातु द्रवावस्था में एकत्रित होती रहती है। गलित धातु के ऊपर धातुमल तैरता रहता है। निचली भारी धातु को निकालने के लिए नीचे एक छेद होता है और ठीक इसके ऊपर वाले भाग में हल्के धातुमल को निकालने के लिए एक निकास द्वार होता है।
कार्यविधि-इस भट्ठी में सान्द्रित अयस्क का प्रगलन किया जाता है। इसके लिए सान्द्रित अयस्क में कोक तथा उपयुक्त गालक की उचित मात्रा मिलाकर मिश्रण को चार्ज के रूप में हॉपर के द्वारा वात्या भट्ठी में डाला जाता है। यह मिश्रण भट्ठी के ऊपर नीचे की ओर जाने पर भिन्न-भिन्न बढ़ते तापों के सम्पर्क में आ जाता है क्योकि भट्ठी में कई प्रकार की रासायनिक अभिक्रियाएँ होती रहती है। फलस्वरूप अयस्क में उपस्थित आधात्री गालक से क्रिया करके धातुमल बना लेती है। धातु अयस्क कोक के द्वारा अपचयित होकर मुक्त धातु देता है जो पिघलकर चूल्हे में एकत्रित हो जाती है।
धातुमल के कारण लोहा वायु की ऑक्सीजन के सम्पर्क में आकर ऑक्सीकृत नहीं होने पाता क्योंकि यह भट्ठी के निचले भाग में गलित अशुद्ध आयरन, के ऊपर एक परत के रूप में इकट्ठा हो जाता है। धातुमल को निकास द्वार से, पृथक् कर दिया जाता है। गलित अशुद्ध आयरन को निचले निकास द्वार बाहर निकाल लेते है।
वात्या भट्ठी से प्राप्त लोहा कच्चा लोहा (pig iron) कहलाता है। इसमें 92-93% Fe, 3 से 4% स (ग्रेफाइट एवं सीमेण्टाइट `Fe_3C` के रूप में) तथा अन्य धातुओं (Mn, P, Si, S आदि) की अशुद्धियाँ रहती हैं। कच्चे लोहे का उपयोग मुख्यत: ढलवा लोहा, पिटवा लोहा और इस्पात के निर्माण में किया जाता है।
ढलवाँ लोहा (Cast iron)-ढलवां लोहे का निर्माण कच्चे लोहे (pig iron) को रद्दी लोहे (scrap iron), कोक और चूना पत्थर के साथ एक ऊर्ध्वाधर भट्ठी जिसे क्यूपोला भट्ठी (cupola furnace) कहते हैं, में पिघलाया जाता है जिससे अशुद्धियों की अल्प मात्रा ऑक्सीकृत होकर धातुमल बनाकर पृथंक हो जाती है। इस प्रकार प्राप्त गलित अशुद्ध लोहा ढलवाँ लोहा (east iron) कहलाता है। ढलवा लोहे को साँचों में डालकर विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ जैसे ड्रेन-पाइप, मैनहोल के ढक्कन आदि बनाए जाते हैं। यह लोहा अत्यधिक कठोर तथा भंगुर होता है। इसमें 2-4%C,93-94% Fe तथा शेष Si, P, S व Mn की अशुद्धियाँ होती हैं।
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